आइये देखते हैं मुख़्तलिफ़ सभ्यताओं में बिल्ली का क्या किरदार था

एक छलांग इधर, दूसरी उधर!
कभी यहाँ तो कभी वहाँ!

अपनी मर्ज़ी से आना, मर्ज़ी से जाना, न किसी की सुनना न दुनिया की परवाह।

ये किसी क़लन्दर की कहानी नहीं, हमारी और आपकी बिल्लियों की है!

आज इंटरनेट पर देखे जाने वाले सबसे ज़ियादा वीडियो और तस्वीरें बिल्लियों की हैं लेकिन बिल्लियाँ इंटरनेट से मशहूर नहीं हुई हैं, बिल्लियाँ हर सदी में किसी न किसी वज्ह से ख़ास रहीं हैं।

प्राचीन मिस्र में ‘बेस्टेट’ (Bastet) जो मौसिक़ी, जंग, मातृत्व और इत्र की देवी मानी जाती थीं, वो पहले शेर का सर और इंसान का बदन रखती थीं, कुछ वक़्त बाद शेर के सर की जगह घरेलू बिल्ली के सर के साथ उनको पूजा जाने लगा, प्रान चीमिस्र में बिल्लियों का दर्जा बहुत ऊंचा था और उन्हें नुक़सान पहुंचाने की सज़ा भी उतनी ही बड़ी थी!

प्राचीन रोम में भी बिल्लियों को आज़ादी की अलामत के तौर पर देखा जाता था। माना जाता है कि जो नस्ल “पर्शियन कैट” के नाम से दुनिया में मशहूर है, वो पैदा दर अस्ल पर्शिया यानी ईरान में नहीं बल्कि इजिप्ट (मिस्र) में हुई थी और वहाँ से ईरान लायी गयी जहाँ और क़िस्में बनीं।

इसीलिए बिल्ली का सफ़र मिस्र से अब ईरान की तरफ़ बढ़ता है, ज़ोरोस्ट्रियन मज़हब और संस्कृति में बिल्ली को “गुरबग” कहा जाता था उसी से आज की फ़ारसी का लफ़्ज़ बना “गोरबे” (Gorbeh), फ़ारसी में बिल्ली को “गोरबे”/गोरबा कहते हैं।

माइथोलोजी में बिल्ली की पैदाइश

पैग़म्बर नूह की कश्ती पर बिल्ली की पैदाइश मानी जाती है, “Noah’s ark” पर जब चूहे बहुत बढ़ गए तो पैग़म्बर नूह ने ख़ुदा से मदद माँगी, ख़ुदा ने उन्हें शेर का सर सहलाने के लिए कहा, शेर का सर सहलाते ही शेर को छींक आयी और बिल्लियाँ निकलीं, इसीलिये बिल्ली और शेर में तअल्लुक़ माना जाता है (मिथक से अलग विज्ञान भी बिल्ली और शेर को फ़ेलिडि/ Felidae फैमिली में रखता है), इन्हें एक साथ फ़िलाइन भी कहते हैं।

यहाँ सबसे दिलचस्प बात ये है कि कुछ लोगों ने शेर की नाक से निकलने के कारण बिल्ली को शेर की गन्दगी समझा और उन्हें बुरा मानने लगे, वहीं कुछ लोगों ने उन्हें शेर का हिस्सा समझा और उन्हें बहादुरी की निशानी समझ कर प्यार करने लगे। शेर के सर से निकलने को फ़ारसी में “अज़ दमाग़ ए शेर ओफ़तादा” कहा गया।

यहाँ हम ज़बान, अदब और सोच को एक ही क़िस्से से एक दूसरे के बिल्कुल उल्टी तरफ़ जाते हुए देख सकते हैं, एक तरफ़ बिल्ली शेर की गन्दगी मानी गयी, दूसरी तरफ़ शेर का हिस्सा।

बिल्लियों का पालतू से प्यारा हो जाना

बुरा मानने की वज्ह से कई जगह बिल्लियाँ पसन्द नहीं की जातीं थीं, ये माना जाता था कि बिल्लियों में शैतान है या बुरी आत्माएं हैं या बिल्लियाँ जादू जानती हैं, इनमें भी काली बिल्ली ख़ास तौर से बदनाम थी।

धीरे धीरे वक़्त बदला और बिल्लियों को पालतू की तरह रखा जाने लगा, बिल्लियों से मोहब्बत के सबब एक क़िस्सा है कि एक बार एक सूफ़ी शेख़ ने बिल्ली पाली, बिल्ली उन्हें इतनी अज़ीज़ थी कि बिल्ली को मुसल्ले (वो चादर जिस पर नमाज़ पढ़ते हैं) तक पर आने की इजाज़त थी, बिल्ली के पंजों से गंदगी न हो इसलिए वो जूते पहने रहती थी, एक बार बिल्ली की किसी गुस्ताख़ी पर शेख़ के नौकर ने उसे मारा, जब शेख़ को ये बात पता चली तो उन्होंने नौकर को बिल्ली से माफ़ी माँगने का हुक्म दिया जिसकी तामील तुरन्त की गई!

इमाद फ़क़ीह किरमानी के बारे में कहा जाता है कि उनके पास एक बिल्ली थी जिसे उन्होंने नमाज़ अदा करना सिखा दिया था, और वो हू-ब-हू अपने शैख़ की तरह ही नमाज़ पढ़ने लगी थी।

इसी वाक़ये और बिल्ली के नमाज़ी होने पर हाफ़िज़ का एक मज़ाहिया/व्यंग्यात्मक शे’र भी है,

ऐ कब्क-ए-ख़ुश-ख़िराम कुजा मी रवी, ब ईस्त
ग़र्रा म-शव के गुरबा ए ज़ाहिद नमाज़ कर्द

ऐ चकोर तू इतना ख़ुश हो कर कहाँ जाता है, रुक!
बेफ़िक्र न हो कि ज़ाहिद की बिल्ली नमाज़ पढ़ने लगी है

इसका एक इशारा तो पंचतंत्र की कहानी की तरफ़ है, (पंचतंत्र की कहानियों का अरबी में “कलीला व दिमना” नाम से तर्जुमा भी हुआ है) कहानी में एक ख़रगोश और चकोर के बीच झगड़ा हो जाता है, वो तय करते हैं कि एक बिल्ली जो बहुत नेक है, ख़ुदा से डरने वाली है, नमाज़ी है, उसी से इस झगड़े का फ़ैसला करवाया जाए, बिल्ली इन दोनों को आते देख आँख मूँद कर इबादत में होने का नाटक करती है, जैसे ही ये उसके पास पहुँचते हैं, वो इन्हें निपटा देती है।

कलीला व दिमना की तरह ही और भी कहानियाँ हैं जो मूल रूप से ग्रीक “ईसप की कहानियाँ” (Aesop’s fables) से प्रेरित हैं। इनमें सबसे ज़ियादा जानी पहचानी मसनवी है ओबैद ज़ाकानी की “मू़श ओ गोरबा” (चूहा और बिल्ली), इस कहानी में भी बिल्ली एकदम संत हो जाती है और जब चूहे बेफ़िक्र हो कर उसके पास आते हैं तो सबको खा जाती है!
पंचतंत्र की कहानियाँ, ईसप की कहानियाँ, ज़ाकानी की कहानियाँ और बाक़ी प्रचलित लोक कथाएं कुछ बदलाव के साथ ग्रीक से हिंदुस्तान तक काफ़ी एक सी हैं।

चूहा और बिल्ली की कहानियाँ इतनी मशहूर ए ज़माना थीम बन गयी कि हम सबके बचपन के पसंदीदा कार्टून टॉम एंड जेरी भी इसी तर्ज पर बनाए गए।

मुझे ऐसा लगता है कि शायद “नौ सौ चूहे खा कर बिल्ली हज को चली” वाला मुहावरा भी इन्हीं कहानियों से बना है।

इसके अलावा ज़ाकानी ने ईसप की और कहानियों का भी फ़ारसीकरण किया जिनमें कई जगह लोमड़ी या और जानवरों को हटाकर बिल्ली लायी गयी!

हम सब अंग्रेज़ी की “Grapes are sour” और हिंदी की ” अंगूर खट्टे हैं” वाली कहावत से वाक़िफ़ हैं और इसमें अहम किरदार में एक लोमड़ी होती है, फ़ारसी में लोमड़ी की जगह बिल्ली है और कहानी की सीख है गोरबे दस्तश बगोश्त नमी रसीद, मिगे “पिफ़ पिफ़ बू मिदे”, बिल्ली गोश्त तक पहुँच नहीं सकती इसलिए कहती है कि उफ़ उफ़ गोश्त से बदबू आती है!
बिल्लियों के मिज़ाज से भी लोग ख़ूब वाक़िफ़ थे, उनकी चोरों से भी तुलना की गई है, ये भी माना गया है कि बिल्लियों में जिन्न बसते हैं, लेकिन एक बात जो बिल्ली का हर आशिक़ समझता है वो ये कि बिल्लियाँ बे-परवाह होती हैं, आप चाहे उनकी मोहब्बत में दीवाने हो जाओ, उन पर कोई असर नहीं होता! बिल्ली कई मा’नों में महबूब से भी ज़ियादा मग़रूर और तंगदिल बल्कि संगदिल होती है! यक़ीन न आए तो ये कहावत देखिए, ”बे गोरबा गोफ़्तंद फ़ज़ला-अत दरमान अस्त, ब-ख़ाक कर्द”

जब बिल्ली को बताया गया कि उसका पाख़ाना दवा है तो बिल्ली ने जा कर उस पर मिट्टी डाल दी/ उसे छुपा दिया कि ये किसी के काम न आ जाए!

लेकिन ऐसा नहीं है कि बिल्ली बस ख़ुदगर्ज़ ही है, ख़ुदगर्ज़ी का एक पहलू ख़ुद्दारी भी है, किंवदंती है कि बिल्ली हमेशा अपने पैरों पर ही ज़मीन पर आती है क्योंकि अली ने उसकी पीठ सहलायी थी। इस पर कहावत बनी, गोरबा ये मोर्तज़ा अली ये उन लोगों के लिए कहा जाता है जो मुश्किल से मुश्किल हालात में भी “अपने पैरों पर खड़े रहते हैं”।

पर बिल्लियाँ चाहे जितनी भी संगदिल और मग़रूर हों, कितनी ही ख़ुद्दार हों, हम सब ता क़यामत उनकी मोहब्बत में गिरफ़्तार ही रहेंगे, जब मीर तक़ी मीर और ग़ालिब तक न बच पाए तो हम और आप क्या हैं!

अगली बार बात करेंगे हमारे उस्ताद शायर, ख़ुदा ए सुख़न मीर की जो मोहिनी पर मोहित हो गए!