Rekhta Rauzan

रेख़्ता रौज़न देवनागरी लिपि में प्रकाशित होना क्यूँ ज़रूरी है?

सोशल मीडिया और इन्टरनेट पर उर्दू और उससे संबंधित साहित्य को सिर्फ़ एक क्लिक कर खोजने वालों के लिए रेख़्ता फ़ाउंडेशन एक जाना पहचाना नाम है। रेख़्ता फ़ाउंडेशन ने बहुत कम समय में अपने मे’यार की बदौलत साहित्य प्रेमियों के बीच एक ख़ास पहचान बनाई है। उर्दू, हिन्दी और रोमन भाषाओं में शायरी और साहित्यिक रचनाएं इस वेबसाइट पर बड़े क़रीने से सजाई गई हैं। आप रेख़्ता के सर्च बार में कोई भी शब्द लिख कर सर्च कीजिए वो फ़ौरन हरकत में आकर उस शब्द से संबंधित साहित्य को आपके समक्ष पेश कर देता है। इस कारनामे को अंजाम देने के लिए वर्तमान समय के मुन्शी नवल किशोर श्री संजीव सराफ़ और उनकी पूरी टीम धन्यवाद की पात्र है।

अब रेख़्ता फ़ाउंडेशन अपने साहित्य प्रेमी पाठकों के बीच ख़ूबसूरत अदबी तोहफ़े के रूप में एक उत्तम साहित्यिक पत्रिका “रेख़्ता रौज़न” के नाम से ले कर आया है। ये पत्रिका इस लिए ख़ास है कि इसमें उर्दू रस्म उल ख़त जानने वालों के साथ साथ देवनागरी लिपि जानने वाले उर्दू साहित्य प्रेमियों के लिए ऐसा समृद्ध साहित्य एक जगह एकत्रित कर दिया गया है जो आम तौर पर नहीं होता है।

यहाँ उर्दू के मारूफ़ अदीब, शायर, और कई किताबों के लेखक फ़ारूक़ अर्गली का कथन कोट करने योग्य है। वह कहते हैं कि,

“ये सिर्फ़ रिसाला नहीं एक मुहिम है, माज़ी को खंगालने की, हाल को उजालने की और मुस्तक़बिल (भविष्य) को संभालने की।”

“रेख़्ता रौज़न” के पहले अंक में आपको बड़े बड़े नाम नज़र आयेंगे फिर ऐसा भी नहीं है कि “नाम बड़े और दर्शन छोटे हों” वाला मामला हो, बल्कि इसमें सौ प्रतिशत नहीं तो सत्तर-अस्सी प्रतिशत रचनाएं ज़रूर प्रथम श्रेणी की हैं। पर मैं अपनी राय पर अडिग नहीं हूँ। आप ख़ुद पढ़ेंगे तो इसका अंदाज़ा आपको बख़ूबी हो जाएगा।

यह बहुमूल्य पत्रिका उर्दू और देवनागरी दोनों लिपियों में प्रकाशित हुई है। लोगों के मन में यह प्रश्न ज़रूर उठ रहे होंगे कि इसको देवनागरी में क्यूँ प्रकशित किया जा रहा है जबकि यह एक उर्दू पत्रिका है तो इसका जवाब भी आपके सामने मौजूद है कि आजकल उर्दू से प्रेम करने वालों की तादाद में लगातार इजाफ़ा हो रहा है। और यह वह लोग हैं जो उर्दू पढ़ना चाहते हैं मगर वक़्त की कमी की वजह से वो उर्दू सीख नहीं पाते हैं। ऐसे लोगों तक उर्दू ज़बान और उसका समृद्ध साहित्य पहुंचाने के लिए ज़रूरी था कि एक ऐसी उर्दू पत्रिका लाई जाए जो दोनों ज़बानों के बीच पुल का काम करे। इसी लिए त्रैमासिक पत्रिका “रेख़्ता रौज़न” को देवनागरी में भी प्रकाशित करने का फ़ैसला किया गया है जिसका हम सभी को स्वागत करना चाहिए।

उर्दू और हिन्दी को लेकर एक सवाल बार बार किया जाता है कि दोनों में क्या रिश्ता है और यहां तक कहा जाता है कि उर्दू मुसलमानों की ज़बान है तो सबसे पहले मैं स्पष्ट कर दूँ कि उर्दू किसी एक फ़िरक़े की ज़बान नहीं है। हमें मालूम होना चाहिए कि माहिर ए ग़ालिबयात मालिक राम रहे हैं, माहिर इक़बालियात पंडित जगन्नाथ आज़ाद रहे हैं, डॉ. गोपीचंद नारंग को पूरी अदबी दुनिया उर्दू के हवाले से जानती है। हम सभी को इल्म है कि यह दोनों ज़बानें एक दूसरे की पूरक कहलाती हैं, इस बारे में हमें यह भी मालूम होना चाहिए कि उर्दू हिन्द आर्याई ज़बान का ही नया रूप है। उर्दू और हिन्दी दोनों ज़बानों का आधार एक है यानी खड़ी बोली। यह दोनों ज़बानें सगी बहनों की तरह हैं। मशहूर शायर मुनव्वर राना ने अपने इस शेर के ज़रिए इन दोनों ज़बानों के रिश्ते को किस ख़ूबसूरती से पेश किया है।

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इसी तरह कला के क्षेत्र में पद्म भूषण सम्मान पाने वाले अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विद्वान और वरिष्ठ साहित्य कार डॉ. गोपीचंद नारंग ने अपनी किताबों में उर्दू और हिंदी के सम्बंध में लिखा है और बी बी सी को दिए गए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि,

“उर्दू और हिंदी में गोश्त और नाख़ुन का रिश्ता है जो अलग हो ही नहीं सकता।”

उर्दू के एक और वरिष्ठ साहित्यकार और विद्वान अब्दुल सत्तार दलवी अपनी किताब “दो ज़बानें, दो अदब” के पेश लफ़्ज़ (प्रस्तावना) में इन दोनों ज़बानों को एक ही माँ की दो बेटियाँ बताते हैं।

इसी तरह एक और शायर डॉ. रहमान मुसव्विर ने भी इन दोनों ज़बानों के रिश्ते बारे में क्या ख़ूब कहा है कि,

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और फिर हम सभी जानते हैं कि उर्दू साहित्य ने हमेशा लोगों को अपनी और आकर्षित किया है क्यूंकि इस ज़बान में जो मिठास है, जो तहज़ीब है वो बहुत जल्द लोगों को अपना आशिक़ बना लेती है। शायद इसी लिए मुशायरों के मक़बूल शायर रहे अशोक साहिल ने अपने उर्दू प्रेम को यह ख़ूबसूरत शेर कह कर ज़ाहिर किया,

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इसी तरह शायर मनीष शुक्ला ने भी इस शेर के ज़रिए उर्दू ज़बान के प्रति अपने जज़्बात का इज़हार किस ख़ूबसूरती से किया है,

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इन मिसालों के अलावा उर्दू ज़बान अपना एक इतिहास है और इस ज़बान में जो साहित्य है वो बड़ा समृद्ध है। इसलिए रेख़्ता फ़ाउंडेशन की यह कोशिश है कि इस ज़बान के समृद्ध साहित्य को उर्दू न जानने वाले साहित्य प्रेमी पाठकों तक पहुंचाया जाए ताकि वो उर्दू भाषा को और क़रीब से जान सकें और उर्दू पढ़ने वाले पाठकों की तादाद में इज़ाफ़ा हो सके।

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