Articles By Dheerendra Singh Faiyaz

धीरेन्द्र सिंह फ़य्याज़ भाषा और साहित्य के एक संजीदा पाठक एवं शाइर हैं। उनका अध्ययन व्यापक है और वे वर्तमान साहित्यिक और काव्य समस्याओं पर गहरी नज़र रखते हैं। फैय्याज़ जितने संजीदा पाठक हैं उतने ही संजीदा लेखक और शाइर भी हैं। पढ़ने पढ़ाने में बेहतरीन क्षमता के कारण साहित्य के समकालीन परिदृश्य में अपने पाठकों व शिष्यों में वह अत्यन्त सम्मानित और प्रिय हैं। उनका जन्म 1987 में खजुराहो के पास चँदला नाम के एक क़स्बे में हुआ, इन दिनों धीरेंद्र सिंह स्थाई रूप से इन्दौर में ही रहते हैं। मुम्बई के 26/11 के हमलों पर आधारित अंग्रेज़ी उपन्यास ''वुंडेड मुम्बई'' लिख चुके हैं। इसके अलावा वह उर्दू व्याकरण और छन्द पर भी गहरी पकड़ रखते हैं, इस विषय पर वह एक किताब ''इल्म में भी सुरूर है लेकिन'' लिख चुके हैं जो शीघ्र ही प्रकाशित होगी।

Shamsur-Rahman-Faruqi

सहीह मानों में फ़ारूक़ी साहब एक इनसाइक्लोपीडिया की तरह थे

शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी वो शख़्स थे जिनके मज़ाक़ में भी इल्म निहाँ होता था। ये मुबालग़ा नहीं होगा अगर ये कहा जाए कि फ़ारूक़ी साहब को सिर्फ़ 10 घंटे सुन कर आप उर्दू अदब के ग्रेडुएट हो सकते हैं।

Ghalib Kaun Hai

जब मीर ने ग़ालिब के बारे में एक अजीब बात कही

ग़ालिब कौन है, अब हम उससे क्या बताएँ कि जो ग़ालिब ही से पूछ रहा हो कि ग़ालिब कौन है। बहुत ग़ौर करें तो इसी शे’र में ग़ालिब निराश हो कर ये कहते हुए भी नज़र आते हैं कि- ”वो हमसे पूछ रहे हैं कि ग़ालिब कौन है तो कोई हमीं को बतलाओ कि हम क्या बतलाएँ कि हम कौन हैं।

Diwan aur Kulliyat ka farq

दीवान और कुल्लियात का फ़र्क़

दीवान से मुराद किसी शाइर की किसी किताब में ग़ज़लों की ता’दात से नहीं होती। दीवान शाइर की उस किताब को कहते हैं, जिसमें बा-क़ाएदा किताब की पहली ग़ज़ल की रदीफ़ का आख़िरी हर्फ़ अलिफ़ ‘अ’ (ا ) होता है और आख़िरी ग़ज़ल की रदीफ़ का आख़िरी हर्फ़ बड़ी ‘ये’ (ے) होता है।

Urdu Rasm-ul-Khat

उर्दू रस्म-उल-ख़त सीखना क्यों ज़रूरी है

किसी भी ज़बान को पूरी तरह से समझने के लिए, उसके एक-एक लफ़्ज़ के मआनी तक पहुँचने के लिए सबसे पहले ज़रूरी है, कि हमें उस ज़बान की रस्मुल-ख़त यानी लिपि (script) का इल्म होना चाहिए। जब तक हम कोई ज़बान अच्छी तरह से पढ़ और लिख नहीं सकते, हम उस ज़बान से पूरी तरह वाक़िफ़ भी नहीं हो सकते।

Sher Mein Ek Lafz Ki Kahani

शेर में एक लफ़्ज़ की हैसियत

अच्छा शेर कहने से पहले हमें कई बातों का ध्यान रखना पड़ता है। अव्वल तो यह कि हमारा ख़याल यानी शेर का मौज़ूअ क्या है, और हम उसे पेश कैसे कर रहे हैं? शेर का मतलब होता है ”कोई एक बात, कोई एक मौज़ूअ दो मिसरों में कहना न कि दो मुख़्तलिफ़ मौज़ूअ दो मिसरों में कहना।

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