10 बेहतरीन उर्दू किताबें

लॉकडाउन के दौरान उर्दू साहित्य के शीर्ष 10 पुस्तकों को पढ़ें

अच्छी किताब अपने पाठक के लिए ऐसे दोस्त की हैसियत रखती है जो उस को कभी तन्हाई का एहसास नहीं होने देती, यह एक ऐसे हमसफर की तरह है जो अपने साथी को दूर दराज़ के इलाक़ों और शहरों की घर बैठे सैर करा देती है, आजकल हम करोना की वबा के कारण सफ़र नहीं कर सकते, सब अपने अपने घरों में वक़्त गुज़ारी कर रहे हैं, ज़िंदगी की यकसानियत ने बोर कर रखा है, ऐसे महामारी के समय में किताब हमारी बेहतरीन हमनशीन हो सकती है, क्योंकि मुताला इन्सान से ग़म और बेचैनी को दूर करता है, सुस्ती और काहिली को ग़ालिब नहीं आने देता, ज़हनी तनाव को ख़त्म करके माहौल को पुरसुकून बनाता है और फ़ैसला करने की सलाहियत को जिला बख़्शता है, मुताला हमें बलंद ख़याली और बसीरत की सिफ़त से आरास्ता करता है। रेख़्ता हर बुरे भले वक़्त में अपने पाठकों के साथ खड़ा होना चाहता है, इसी लिए रेख़्ता rekhta.org ने अपने पाठकों के लिए, मुख़्तलिफ़ हज़-ओ-ज़ायक़ा की दस ऐसी किताबों का इंतिख़ाब किया है जिन्हें पढ़ कर इस मुश्किल वक़्त की मग़्मूम फ़िज़ा को ख़ुशगवार बनाया जा सकता है।

दिल्ली जो एक शहर था

“दिल्ली जो एक शहर था आलम में इंतिख़ाब” हाँ, वही दिल्ली जहां से इलम-ओ-अदब का सूरज तुलु हुआ, जो उर्दू ज़बान-ओ-अदब की पुख़्ता रसदगाह है, जहां से सितार-ए-इमतियाज़ का ज़हूर होता है और मीर-ओ-ग़ालिब का पता मिलता है, वहां जब क़हर-ए-ग़म-ए-उल्फ़त-ओ-रोज़गार पड़ता है तब भी लोग उसे सीने से लगाए रहते हैं, जहां की वज़ादारी और मुहब्बतें मशहूर हैं, जो ख़्वाजगान की सरज़मीन कहलाती है, जिसकी तहज़ीब-ओ-तमद्दुन के एहराम कई बार मिस्मार हुए, कई बार तामीर हुए, वो दिल्ली और दिल्ली वालों की खूबियां अब दरगोर और दर किताब हैं। इस किताब के मुन्दर्जात उसी दिल्ली की बाज़याफ़्त हैं, शाहिद अहमद देहलवी साहिब-ए-उसलूब अदीब हैं, ज़बान का बरमहल इस्तिमाल और मुहावरों को बरतने का सलीक़ा उन्हें विरासत में मिला, उनके यहां दिल्ली की बोली ठोली और टकसाली ज़बान का इस्तिमाल बहुत सलीक़े सैकिया गया है।

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“काफ्का के अफ़साने”

फ़राँज़ काफ्का का शुमार बीसवीं सदी के बेहतरीन फ़िक्शन निगारों में किया जाता है, नए उर्दू अफ़साने पर बराह-ए-रास्त या बिलवासता काफ्का का काफ़ी असर पड़ा है, काफ्का को अदबी दुनया में पेचीदा तरीन दिमाग़ का मालिक समझा जाता है, उस की तहरीरों में कई तरह की तावीलों के जवाज़ मौजूद हैं, उस की तमसीलों पर तमसील का गुमान नहीं गुज़रता बल्कि उस का पाठक अनहोनी बातों को एक हक़ीक़त समझ कर तस्लीम कर लेता है, यही काफ्का का कमाल है। इस किताब में काफ्का की छोटी बड़ी बीस तहरीरें शामिल हैं, जिनको नय्यर मसऊद साहिब ने तर्जुमा किया है, कहानी के साथ नय्यर मसऊद के उस्लूब-ए-बयान से भी लुतफ़ अंदोज़ हो सकते हैं।

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“बजंग आमद”

यह किताब उर्दू अदब के मशहूर-ओ-मारूफ़ मज़ाह निगार कर्नल मुहम्मद ख़ान की ज़माना-ए-जंग की गुज़ारी हुई ज़िंदगी की दास्तान पर मबनी है। इस किताब में जहां बहुत सी होनी और अनहोनियों का ज़िक्र है, जहां बहुत से पुर-लुत्फ़ यादगार और काबिल-ए-ज़िक्र वाक़ियात, और यारान-ए-दिलदार का ज़िक्र है वहां उन्होंने अपनी इस किताब की मारिफत और अपनी ख़ुश-बयानी की बिना पर उनकी ऐसी तस्वीर खींची है कि इन सबको दास्तान-ऐ-जावेदाँ बना दिया है, मुमताज़ मज़ाह निगार सय्यद ज़मीर जाफ़री किताब के बारे में फ़रमाते हैं, “कि इन्सानों की तरह किताबें भी बहुत तरह की होती हैं। मसलन “बुज़ुर्ग किताबें”, “नादान किताबें वग़ैरा वग़ैरा। “बजंग आमद एक “दोस्त किताब है यानी ऐसी किताब जिस पर दिल टूट कर आजाए। जिसके साथ वक़्त गुज़ार कर आदमी दिली राहत महसूस करे। जिससे बार-बार गुफ़्तगू करने को जी चाहे। दोस्त, जो ख़ुश-रू भी है, ख़ुशमज़ाक़ भी। शोख़ भी है और दिलनवाज़ भी। ज़हीन भी है और फ़तीन भी, और हँसमुख इतना कि जब देखे होंटों पर हंसी आई हुई हो”

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“बहाव”

यह पाकिस्तान से प्रकाशित होने वाला एक उर्दू नावेल है, जिसे उर्दू के मशहूर-ओ-मारूफ़ मुसन्निफ़ मुस्तंसिर हुसैन तारड़ ने तहरीर किया है। इस नावल का मौज़ू वादी-ऐ-सिंध की तहज़ीब है। इस नावेल में तारड़ ने तख़य्युल के ज़ोर पर एक क़दीम तहज़ीब में नई रूह फूंक दी। “बहाव” में एक क़दीम दरिया सरस्वती के मादूम और ख़ुशक हो जाने का बयान है, दरिया आहिस्ता-आहिस्ता इतना ख़ुशक हो जाता है कि ज़िंदगी ख़त्म होजाने के करीब पहुँच जाती है, और पानी जो ज़िंदगी का अहम उन्सुर है, वह सूख जाता है। इस तबाही से बहुत से हैवानात मर जाते हैं। कुछ दुनिया से हमेशा हमेशा के लिए ख़त्म हो जाते हैं। डाइनासोर जैसे बड़े जानवर ख़त्म हो जाते हैं मगर इन्सान वाहिद हैवान है जो महफ़ूज़ रहता है। इस नावेल का दिल-चस्प उन्सुर भी यही है कि इन्सान, एक ऐसी अजीब-ओ ग़रीब चीज़ है जो इन तमाम हादिसात-ओ-वाक़ियात और तबाही (Disaster) के बाद भी बच निकलने में कामयाब रहती है। इस नावेल में हैरानकुन चीज़, मुस्तंसिर हुसैन तारड़ का मज़बूत तख़य्युल है जो पाँच हज़ार साल पहले की तहज़ीब हमारी आँखों के सामने ला खड़ी करता है।

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“गुमनाम आदमी का बयान”

यह शायर-ओ-सहाफ़ी फ़ाज़िल जमीली का पहला मजमूआ-ऐ-कलाम है, फ़ाज़िल जमीली एक बाकमाल शायर हैं, उनकी नज़मों में ज़िंदगी रवाँ-दवाँ दिखाई देती है, उनका मजमूआ-ऐ-कलाम ख़ूबसूरत अशआर से मुज़य्यन है। वो नज़म और ग़ज़ल पर यकसाँ क़ुदरत रखते हैं, इस मजमूआ में ग़ज़लों के अलावा छोटी बड़ी तक़रीबन सत्तर नज़्में भी हैं, जो बहुत आसान ज़बान में कही गई हैं, जिनके मुताला से मुख़्तलिफ़ किस्म की तस्वीरें उभरती हैं, जो कभी कभी मायूस भी कर देती है। फ़ाज़िल जमीली लफ़्ज़ों के मुसव्विर हैं, एहसास को ख़ूबसूरती अता करते हैं। उनकी शायरी जदीद दौर के तक़ाज़ों से मुताबिक़त रखती है, ये मजमूआ शुरू करने के बाद ख़ुद को पढ़वाता और मनवाता है, यहां बहुत कुछ है। सोज़-ओ-गुदाज़, जिद्दत तराज़ी, नुक्ता रसी, ऐसे ऐसे पुरख़याल अशआर हैं जिनको पढ़ कर एक तरह का इतमीनान मिलता है।

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“चलते हो तो चीन को चलये”

इब्ने इंशा ने यूनेस्को के मुशीर की हैसियत से कई यूरोपीय और एशियाई देशों का दौरा किया था, जिनका अहवाल अपने सफ़र नामों में मख़सूस तंज़िया-ओ-फ़काहिया अंदाज़ में तहरीर किया। मज़ाह के पर्दे में मुल्की-ओ-बैन-उल-अक़वामी सियासत पर बलीग़ तंज़ उन्ही का तुर्रा-ऐ-इमतियाज़ है। पैरोडी का अंदाज़, वुसअत-ऐ-मालूमात, सियासी बसीरत और सूरत-ऐ-वाक़िया से मज़ाह कशीद करना वो ख़ास अनासिर हैं जिनकी बदौलत इब्ने इंशा को अदबी लेजंड का ताज मिला। इब्ने इंशा उर्दू के एक बड़े मज़ाह निगार हैं, उनका उस्लूब और आहंग नया ही नहीं, नाक़ाबिल-ऐ-तक्लीद भी है, सादगी-ओ-पुरकारी, शगुफ्तगी-ओ-बेसाख्तगी में वो अपनी नजीर नहीं रखते, मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी ने इब्ने इन्शा के मज़ाहिया उस्लूब के हवाले से लिखा, “बिच्छू का काटा रोता और साँप का काटा सोता है। इन्शा जी का काटा सोते में मुस्कुराता भी है। 1981 तक ये सफ़र माना तक़रीबन 9 बार पब्लिश हो चुका था, इस से इस सफरनामा की कुछ मक़बूलियत का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

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“मजमुआ मिर्ज़ा अज़ीम बेग चुगताई”

यह मिर्ज़ा अज़ीम बेग चुग़्ताई की तहरीरों का मजमूआ है, जिसमें उनके कुछ ड्रामे, दास्तान और मज़ामीन शामिल हैं, उर्दू ज़बान को तन्ज़ो मज़ाह से जिन अदीबों ने पूरी तरह मुज़य्यन किया, उनमें दीगर फ़नकारों के साथ मिर्ज़ा अज़ीम बेग चुग़्ताई का भी बड़ा हिस्सा है, वो ज़िंदगी को पेश करने वाले अदीब हैं, बहुत मुश्किल हालात में ज़िंदगी बसर की, उन्होंने ज़िंदगी को बहुत क़रीब से देखा है और अपनी तहरीरों में कारवान-ऐ-हयात के मुख़्तलिफ़ पहलूओं को उजागर किया है, मिर्ज़ा अज़ीम बेग ने अपनी तहरीरों में ख़ुशमिज़ाजी और ज़िंदा-दिल्ली को इस तरह शामिल किया कि वो मुआशरती इस्लाह का ज़रिया बन गईं। वो चहार-दीवारी के अंदर मचलती हुई ख़्वाहिशों को इतने चुलबुले अंदाज़ में पेश करते हैं कि पाठक के लबों पर ना सिर्फ तबस्सुम रक़्स करने लगता है बल्कि वो बहुत कुछ सोचने पर भी मजबूर हो जाता है। वो अपनी तहरीरों मैं ख़ुद अपनी ज़ात को भी शामिल कर लेते हैं, उनका पुर-ख़ुलूस अंदाज़ और शाइस्ता उस्लूब वाक़ई लायक़-ऐ-तहसीन है।

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“दुख्यारे”

यह अनीस इशफ़ाक़ का बेहतरीन नावल है, अनीस इशफ़ाक़ के नाविलों का मर्कज़ी मौज़ू लखनऊ है, जो तहज़ीब-ओ-तमद्दुन की एक जन्नत थी, जिसकी शामें रक़्स, मौसीक़ी, शायरी, और फुनून-ऐ-लतीफा से जगमगाती थीं, जहां हर तरफ़ ख़ुशहाली थी, इमाम बाड़े, मेले ठेले, चौराहे, बाज़ार जिस की चमक बढ़ाते थे, लेकिन नवाबी दौर के ख़ातमे के साथ ही लखनऊ की चमक माँद पड़ने लगती है, इस नवेल के मर्कज़ी किरदार, बड़े भाई के ज़रीये, गुज़िश्ता लखनऊ के सक़ाफ़्ती अक़दार को दुखी दिल से पेश किया गया है, नावेल की कहानी एक नीम पागल शख़्स की ज़िंदगी को बयान करती हुई, पुरे लखनऊ की तराज्दी की शक्ल में सामने आती चली जाती है, नावेल में लखनवी उर्दू ज़बान का बहुत ख़ूबसूरत इस्तिमाल है।

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“गोया दबिस्ताँ खुल गया”

यह चौधरी मुहम्मद अली रुदौलवी के ख़ुतूत का मुन्तखब मजमूआ है, जिसे उनकी छोटी बेटी हुमा बेगम ने मुरत्तिब क्या है, इस में ज़्यादा-तर ख़ुतूत भी उन्हें के नाम हैं, इन ख़ुतूत की सब से बड़ी ख़ुसूसीयत उनका शगुफ़्ता उस्लूब-ऐ-बयान है। चौधरी साहिब ख़ुश-मिज़ाज, ख़ुश-ज़ौक़, ख़ुश-लिबास और ख़ुशगो इन्सान थे, उनके अंदाज़ बयान में उनकी तबीयत की शोख़ी जाबजा झलकती नज़र आती है।

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“सवानेह उमरी मौलाना आज़ाद”

“सवानेह उमरी मौनवाब सय्यद मुहम्मद आज़ाद का शुमार “अवध पंच” के अहम् लिखारियों में होता है, रशीद अहमद सिद्दीक़ी ने उनको उर्दू के बड़े तंज़िया निगारों में शुमार किया है। ये मुहम्मद हुसैन आज़ाद और अबुल-कलाम आज़ाद के अलावा तीसरे इंशापर्दाज़ आज़ाद हैं, ज़ेर-ए-नज़र किताब मुसन्निफ़ का एक तंज़िया कारनामा है, एक फ़र्ज़ी किरदार जिसको अपने नाम से मौसूम करके, उस की खुद्नविश्त् तहरीर की है, फिर उस किरदार के ज़रीया मुआशरे की अख़लाक़ी पस्ती, ज़बूँहाली और जहां-जहां कमज़ोरी नज़र आई उस की तरफ़ तंज़िया इशारा करके एक मुआशरती और तहज़ीबी ख़िदमत का फ़रीज़ा अंजाम दिया है, उस्लूब-ऐ-बयान निहायत दिलकश है, मुरत्तिब ने इस तख़लीक़ को एक तंजिया नावेल क़रार दिया है, इस में जगह जगह ज़राफ़त की झलकियाँ देखने को मिल जाती हैं, ये नावल “अवध पंच” में क़िस्तवार शाया हुआ, जिसको अपने ज़माने में काफ़ी मक़बूलियत मिली।लाना आज़ाद”

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