ग़ज़ल में मिसरे का टकरा जाना
आपने सबने ये जुमला ख़ूब सुना होगा कि फ़लाँ ग़ज़ल फ़लाँ ग़ज़ल की ज़मीन पर है। ग़ज़ल की ज़मीन से मुराद ग़ज़ल का ढाँचा है या’नी ग़ज़ल की बह’र, क़ाफ़िया और रदीफ़। मतलब ग़ज़ल की ज़मीन क्या है, ये उसके मतले से तय हो जाता है।
आपने सबने ये जुमला ख़ूब सुना होगा कि फ़लाँ ग़ज़ल फ़लाँ ग़ज़ल की ज़मीन पर है। ग़ज़ल की ज़मीन से मुराद ग़ज़ल का ढाँचा है या’नी ग़ज़ल की बह’र, क़ाफ़िया और रदीफ़। मतलब ग़ज़ल की ज़मीन क्या है, ये उसके मतले से तय हो जाता है।
پروفیسر شمیم حنفی ایسے استاد تھے جن کا تعلق شعبۂ اردو جامعہ ملیہ اسلامیہ سے وظیفہ یاب ہونے کے بعدبھی مستقل اور مستحکم رہا۔گذشتہ پندرہ برسوں کے دوران شعبۂ اردو کی علمی وادبی سرگرمیوں کا بہ مشکل ہی کوئی ایسا موقع ہو گا جہاں وہ موجود نہ رہے ہوں۔شعبہ کے طلبا سے ان کاوالہانہ تعلق اور اساتذہ کے دلوں میں ان کے تئیں محبت و احترام کے جذبے نے ایک نئی فضا قائم کررکھی تھی۔
“नया नगर” तसनीफ़ का पहला नॉवेल है। इस नॉवेल में तसनीफ़ ने उर्दू अदब के मुख़्तलिफ़ मसाइल को क़ारईन-ओ-नाक़िदीन के सामने पेश करने की कामयाब कोशिश की है। नॉवेल बेसिकली उर्दू कल्चर के ज़वाल का एक बयानिया है। बयानिया से मेरी मुराद एक कहानी को बयान करने से है ना कि नैरेटिव से। इस नॉवेल में जिन मौज़ूआ’त पे रौशनी डाली गई है उनमें ग़ज़ल, औरत, अदबी और मज़हबी तफ़रक़ा-बाज़ियों का ज़िक्र आता है। इसके अलावा गुजरात राइट्स, इश्क़-ए-ला-हासिल और मीरा रोड से नज़र आने वाली फ़िल्मी दुनिया का बयान भी किया गया है।
पंजाब के रावलपिंडी में 30 अगस्त 1923 को पैदा हुए पिता ने नाम रखा शंकर दास केसरी लाल लेकिन आगे चलकर ‘शैलेन्द्र’ के नाम से शोहरत पायी और इसे ही अपना तख़ल्लुस बनाया । इनके पूर्वज बिहार के आरा ज़िले के रहने वाले थे। एक बार इनके पिता बहुत बीमार पड़ गए घर में ग़रीबी,बदहाली थी ,सो ये सब रावलपिंडी छोड़ मथुरा मुन्तक़िल हुए और यहाॅं अपने एक रिश्तेदार जो रेलवे में काम किया करते थे उनके पास चले आए पर वहाॅं भी हालात सुधरे नहीं।
फ़राज़ रिहाई के बाद ऑफ़िस में बैठे थे कि फ़ोन की घंटी बजने लगी। उधर से आवाज़ आई, “वज़ीर-ए-आज़म आपसे बात करना चाहते हैं। भुट्टो फ़ोन पर आते ही बोले, ”फ़राज़ दिस इज़ मी, दिस टाइम आई सेवड योर लाईफ़। दे वांट टू ट्राई यू।”
Enter your email address to follow this blog and receive notification of new posts.