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Diwan aur Kulliyat ka farq

दीवान और कुल्लियात का फ़र्क़

दीवान से मुराद किसी शाइर की किसी किताब में ग़ज़लों की ता’दात से नहीं होती। दीवान शाइर की उस किताब को कहते हैं, जिसमें बा-क़ाएदा किताब की पहली ग़ज़ल की रदीफ़ का आख़िरी हर्फ़ अलिफ़ ‘अ’ (ا ) होता है और आख़िरी ग़ज़ल की रदीफ़ का आख़िरी हर्फ़ बड़ी ‘ये’ (ے) होता है।

Urdu Poetry and Mumbai

यहाँ बैठ कर शिकायतें भी होती थीं और मोहब्बतें भी

माया-नगरी मुंबई जैसे एक कोह-ए-निदा है, जो हर वक़्त आवाज़ देता रहता है और लोग-बाग बोरिया-बिस्तर बांधे जूक़ दर जूक़ इसकी तरफ़ भागे चले आते हैं। इस शहर के आकर्षण में समुंदर के अलावा दो और चीजों ने बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

Mir Anees

मीर अनीस, वो फ़क़ीर शायर जो बादशाहों को भी ख़ातिर में नहीं लाता था

मीर अनीस को मर्सिया-निगारी का बादशाह कहा जाता है। उन्होंने मर्सिया-निगारी को उरूज बख़्शा। दुनिया भर में होने वाली मजलिसों में आज भी मीर अनीस के मरासी कसरत से पढ़े जाते हैं।
मीर अनीस जितने अज़ीम शायर थे उतने ही नाज़ुक-मिज़ाज और फ़क़ीर-सिफ़त इन्सान थे। वो रईसों और अमीरों की सोहबत में बैठना पसंद नहीं करते थे। इसका सुबूत उनके हैदराबाद के मुख़्तसर क़याम के दौरान भी नज़र आता है।

Mirza Ghalib Film 1954

जब मंटो ने मिर्ज़ा ग़ालिब पर फ़िल्म बनाई और संवाद बेदी ने लिखा

1954 की “मिर्ज़ा ग़ालिब” उन गिने-चुने दरीचों में से है, जो अवाम को माज़ी में झाँकने का मौक़ा बख़्शती है। फ़िल्म के ख़ूबसूरत मुकालमे राजिंदर सिंह बेदी की क़लम से निकले हैं, जो ख़ुद एक मुमताज़ अदीब रहे हैं।

Husn e Jaana Ki Tareef

इन शेरों की तो पेंटिंग्स भी नहीं बनाई जा सकती

महबूब की तारीफ़ करनी हो या मोहब्बत का इज़हार, सबकी पहली पसंद शायरी है, सबकी ज़िन्दगी में एक दौर ऎसा ज़रूर आता है जब ख़ूब शायरी पढ़ी जाती है और लिखने की कोशिशें भी होती हैं, ये दौर अक्सर मोहब्बत या आज की ज़बान में क्रश या पहले पहले प्यार का दौर होता है।

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