दीवान और कुल्लियात का फ़र्क़
दीवान से मुराद किसी शाइर की किसी किताब में ग़ज़लों की ता’दात से नहीं होती। दीवान शाइर की उस किताब को कहते हैं, जिसमें बा-क़ाएदा किताब की पहली ग़ज़ल की रदीफ़ का आख़िरी हर्फ़ अलिफ़ ‘अ’ (ا ) होता है और आख़िरी ग़ज़ल की रदीफ़ का आख़िरी हर्फ़ बड़ी ‘ये’ (ے) होता है।