Articles By Abhishek Shukla

अभिषेक शुक्ल का जन्म उत्तर प्रदेश के ज़िला ग़ाज़ीपुर में हुआ मगर उनकी उच्च शिक्षा लखनऊ विश्वविद्यालय में हुई, जहाँ से उन्होंने एम.कॉम की डिग्री हासिल की| पिछले 10 -15 वर्षों के बीच जिन लोगों ने ग़ज़ल के मैदान में अपनी छाप छोड़ी है, उनमें अभिषेक शुक्ला एक अहम नाम हैं। उनकी शायरी में ज़िन्दगी से भरपूर इश्क़ की झलक मिलती है, इसके साथ ही ज़बान और क्राफ़्ट का एक बेहतरीन नमूना उनकी शायरी में मौजूद है। उन्होंने बहुत जल्द ही तमाम बड़े आलाचकों का ध्यान अपनी तरफ़ आकर्षित किया है, इसके साथ ही नए लिखने वालों के लिए एक रोल मॉडल के तौर पर भी देखे जाते हैं। ज़बान की बारीकियों और अरूज़ पर गहरी निगाह रखते हैं और कुशलता के साथ चुस्त और चुटीले व्यंग्य के लिए भी चर्चा में हैं. लखनऊ शहर की तमाम ख़ूबसूरती और उसकी संस्कृति को अपने वजूद के अंदर समो कर एक अध्यात्म की शक्ल देने में मशग़ूल हैं। उन पहला काव्य संग्रह ''हर्फ़-ए-आवारा'' 2020 में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ, जिसने बहुत जल्द अदबी हल्क़े में अपनी पहचान बनाई। आप को उर्दू कल्चर की जीती-जागती मिसाल भी कहा जा सकता है। इन दिनों भारतीय स्टेट बैंक की मुलाज़िमत में जान और वक़्त निकाल रहे हैं|

उर्दू इमला और हम्ज़ा का इस्तेमाल

उर्दू पढ़ने लिखने वालों को या पढ़ना लिखना सिखाने वालों को अगर सबसे ज़ियादः कोई हर्फ़ परेशान कर सकता है तो वो हम्ज़ा है। अव्वल तो इस पर बहसें हैं कि इसे हर्फ़ माना भी जाए या नहीं कि इसकी दूसरे हुरूफ़ की तरह अपनी कोई आवाज़ नहीं है।

Lafz, Alfaz

आख़िर लफ़्ज़ कहाँ सुकून का साँस लेते हैं?

हाँ तो हम बात कर रहे थे ग़लती और हरकत और निगरानी जैसे अल्फ़ाज़ की। क्या आपने कभी सोचा कि आम तलफ़्फ़ुज़ में ऐसा होता ही क्यों है कि ग़लती को ग़ल्ती, हरकत को हर्कत बोला जाता है?? ये क्या सिर्फ़ तलफ़्फ़ुज़ के न पता होने का मुआमला है या इसमें कोई अरूज़ या’नी छंदशास्त्र से जुड़ी हुई बात भी है जो बराबर काम कर रही है??

पण्डित दत्तात्रिया कैफ़ी और बे-दख़्ल किये गए शब्दों की कहानी

मतरूकात दरअस्ल उन अल्फ़ाज़ को कहते हैं जिन्हें शाइरी में पहले बग़ैर किसी पाबन्दी के इस्ते’माल किया जाता था मगर बाद में मशाहीर और असातेज़ा ने उनका इस्ते’माल या तो बंद कर दिया या इस्ते’माल रवा रक्खा भी तो कुछ पाबंदियों के साथ रवा रखा। ये भी रहा है कि कुछ अल्फ़ाज़ शाइरी के लिए तो मतरूक हुए मगर नस्र में उनके इस्ते’माल को नहीं छेड़ा गया।

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