Baat karna ya baat karni, बात करना या बात करनी

बात करना या बात करनी – दिल्ली और लखनऊ वालों का मसअला

एक दोस्त का सवाल है कि क्या ये जुमला दरुस्त है “मुझे बात बताना है ” या ये सही है “मुझे एक बात बतानी है” ऐसे ही “बात करना” होना चाहिए या “बात करनी”

अस्ल में उनके सवाल की वजह उनका ये ख़्याल है कि चूँकि लफ़्ज़ ‘बात’ मोअन्नस (Feminine ) है तो इसके साथ “करनी” या “बतानी” आना चाहिए।

ये अस्ल में बात की तज़कीर-ओ-तानीस (Feminine And Masculine) का मसला है ही नहीं आप दोनों तरह के जुमले सुनेंगे, और राइज भी हैं।

“मुझे अपनी ख़ैरियत बतानी है” या “मुझे एक बात कहनी है” ये यक़ीनन हमारे यहाँ ज़ियादा राइज है “ख़ैरियत बताना” और “बात कहना” के मुक़ाबले में, लेकिन सही दोनों हैं।

आप देखिए कि आपकी बात अगर सही मानी जाए कि लफ़्ज़ ‘बात’ मोअन्नस है इस लिए उसके साथ “बतानी” आना चाहिए तो आपका इस जुमले के बारे में क्या ख़्याल है “मैं आप से एक बात पूछना चाहता हूँ” यहाँ आप अपने ख़्याल के मुताबिक़ “बात पूछनी” क्यों नहीं कहना चाहतेॽ

मालूम हुआ कि ये कोई उसूल नहीं, वर्ना “बात पूछना चाहता हूँ” राइज न होता।

अस्ल में इस बखेड़े की वजह है दिल्ली और लखनऊ स्कूल का एक क़दीम इख़्तिलाफ़ मसदरी प्रतीक को ले कर को लेकर। मसदरी प्रतीक कहते हैं वो अलामत जो फे़अल (क्रिया) की अस्ल सूरत यानी मसदर (धातु शब्द) पर लगती है। ‘खिलाना’ ‘पिलाना’ ‘खाना’ ‘देखना’ ‘भागना’ वग़ैरा ये मसदरी सूरतें हैं और उनके आख़िर में जो “ना” है वो अलामत-ए-मसदरी है।

अहल-ए-दिल्ली का कहना ये था कि मसदरी सूरत हो या कोई और सूरत, बहर-सूरत तज़कीर-ओ-तानीस का फ़ैसला इस्म (Noun) की तज़कीर-ओ-तानीस के हिसाब से होगा। यानी बात कहनी, जुमला कहना, हाल सुनाना, कहानी सुनानी। हत्ता कि कुछ हज़रात का ये भी कहना था कि तमन्ना के इज़हार के लिए भी इस्म की तज़कीर-ओ-तानीस का ही एतिबार किया जाएगा। यानी चूँकि बात मोअन्नस है तो तमन्ना के इज़हार में भी ऐसे कहा जाएगा “मैं बात बतानी चाहता हूँ”

अहल-ए-लखनऊ का कहना था कि क्योंकि मसदर लफ़्ज़ की बुनियाद है तो बुनियादी साख़त (संरचना) से छेड़-छाड़ जायज़ नहीं, चुनाँचे इस्म मुज़क्कर (Masculine) हो या मोअन्नस, अलामत-ए-मसदरी हमेशा “ना” ही रहेगा, उसे तबदील नहीं किया जा सकता। फ़ेअल (क्रिया) की बाक़ी सूरतों में इस्म का एतिबार होगा, लेकिन मसदरी सूरत वैसी ही रहेगी, यानी बात बताई, बात कही, बात सुनी, लेकिन जहाँ मसदरी शक्ल आएगी वहाँ बात सुनाना, बात कहना, बात बताना होगा।

रफ़्ता-रफ़्ता हर उसूल में लचक आती है, और वो लचक रिवाज-ए-आम की दैन होती है, और वही ज़बान की बतदरीज तबदीली का बाइस होती है, तो इन दोनों मकातिब के उसूलों में भी लचक आई और जहाँ अहल-ए-दिल्ली का तमन्ना के इज़हार वाला मौक़िफ़ तक़रीबन तर्क कर दिया गया, रिवाज में वहीं बाक़ी सूरतों में दोनों के मौक़िफ़ मक़बूल हुए, बस मक़बूलियत कम या ज़्यादा तो हो सकती है लेकिन दोनों सही भी हैं और चलन में भी हैं।

इस पूरी गुफ़्तगु का मा-हसल ये है कि फे़अल (क्रिया) की तमाम सूरतों में कोई इख़्तिलाफ़ नहीं, सिर्फ़ मसदरी सूरत(धातु शक्ल) इस इस से अलग है, यानी ‘बात कही’ ‘बात सुनी’ ‘बात चली’ ‘बात पूछी’ ‘ख़ैरियत बताई’ इनमें कोई इख़्तिलाफ़ नहीं। यहाँ इस्म मुज़क्कर, तो ये मुज़क्कर, इस्म मोअन्नस तो यह मोन्नस।

बाक़ी बची वो मसदरी सूरत जिसके आख़िर में “ना” आता है तो इस का ये मुआमला है:-

“मुझे एक बात कहना है” – जायज़ है, गो कि इस्तिमाल कुछ कम है।

“मुझे एक बात कहनी है” – जायज़ है और ख़ूब इस्तिमाल में है।

“मैं एक बात पूछनी चाहता हूँ” – ये तक़रीबन प्रयोग से बाहर हो चुका है।

कुछ मिसालें

बात कहना भी तुम्हारा है मुअम्मा कहना
अमीर मीनाई

आख़िरी बात तुमसे कहना है
याद रखना न तुम कहा मेरा
जौन एलिया

हमें शिक्वा नहीं इक-दूसरे से
मनाना चाहिए इस पर ख़ुशी क्याॽ
जौन एलिया

तेरे लह्जे में तिरा जहल-ए-दरूँ बोलता है
बात करना नहीं आती है तो क्यों बोलता है
इर्फ़ान सत्तार

तो हासिल ये है पूरी गुफ़्तुगू का, कि नाउन/ इस्म अगर मुअन्नस है और उसके साथ वर्ब/ फ़े’ल की मसदरी सूरत आए तो अहल-ए-लखनऊ के मुताबिक़ चाहें तो उसे अस्ल पे रख सकते हैं (बात करना नहीं आती) या चाहें तो अहल-ए-दिल्ली की पैरवी करते हुए उसे इस्म के जेंडर के हिसाब से इस्तेमाल कर सकते हैं (बात करनी नहीं आती) और कुछ करने की ख़्वाहिश का इज़हार हो। जैसे फ़ुलाँ काम करना चाहता हूँ, फ़ुलाँ बात बताना चाहती हूँ, इन सूरतों में फ़ेल अब मुज़क्कर ही राइज है यहाँ बात या ख़ैरियत के मुअन्नस होने की वजह से फ़े’ल को मुअन्नस नहीं लाया जाता अब, यानी “बात पूछनी चाहता हूँ” ये मतरूक हो चुका है। हाँ फ़े’ल की बाक़ी सूरतों में इस्म (Noun) जेंडर का ही एतिबार होगा।