Shariq Kaifi

मामूली चीज़ों को ग़ैर-मामूली बना देने वाला शाइर

अगरचे ये शाइरी क्लासिकी उर्दू शाइरी के रिवायती साँचे से बहुत मेल खाती हुई नज़र नहीं आती, लेकिन ये हम-अस्र इंसानी तज्रबात और नफ़्सियात की गहरी तहों को खंगालने में रिवायत और जिद्दत के हर टूल के सहारे से अपना काम करती है। उनकी ग़ज़ल महज़ तख़लीक़ी सलाहियतों के इज़हार का अमल नहीं बल्कि किसी नादीदा-ओ-नायाब नुक्ते की तलाश, समाजी हक़ीक़तों के बयान और इंसानी वुजूद की पेचीदा तहों को बे-नक़ाब करने का ज़रीआ है।

Prose लिखने के लिए कुछ ज़रूरी बातें

नस्र ज़बान की वो सिन्फ़ है, जो तक़रीर के फ़ितरी बहाव (एक तय-शुदा क़वाइद के ढाँचे की पैरवी करते हुए) का इज़हार करती है। नस्र शाइरी की तमाम अस्नाफ़ से जुदा वो सिन्फ़ है, जो शाइरी से वाबस्ता किसी भी तरह की क़वाएद जैसे- बह्र, आहंग, लय, रदीफ़, क़ाफ़िया वग़ैरा पर नहीं बल्कि ज़बान के मुश्तर्का ढाँचे पर मबनी होती है।

उर्दू के बग़ैर पुरानी फ़िल्मों की कल्पना नहीं की जा सकती

बॉलीवुड ने उर्दू का हाथ एक तवील वक़्त से थाम रक्खा है। बिला-शुबा ये बात कही जा सकती है कि उर्दू बॉलीवुड की फ़िल्मों, नग़्मों, डायलॉग्स की ख़ूबसूरती में दिन-ब-दिन इज़ाफ़ा करती आ रही है। शायद ही कोई ऐसी फ़िल्म, नग़्मा, डायलॉग हमारी ज़िंदगी से गुज़रा होगा जिस में आप को उर्दू का रंग कम दिखाई दिया हो, ज़ियादा असरात ज़ेहन-ओ-दिल पर उन्हीं फ़िल्मों, नग़्मों, डायलॉग्स ने किया जिस में उर्दू थी।

Devendra Satyarthi

देवेन्द्र सत्यार्थी: वो आदमी जिसने हिन्दोस्तान के गाँव-गाँव जा कर लोकगीत जमा किए

एक बार साहिर लुधियानवी और देवेन्द्र सत्यार्थी लाहौर से लायलपुर जा रहे थे, लेकिन जब वो स्टेशन में दाख़िल हुए तो उन्हें मालूम हुआ कि गाड़ी पूरी तरह भरी हुई है और किसी भी डिब्बे में तिल रखने की भी जगह बाक़ी नहीं है। कुछ लोग ट्रेन की छत पर भी सवार हैं। साहिर ने… continue reading

Dagh Dehlvi

दिन में ग़ज़ल कहते और रात तक तवायफ़ों / क़व्वालों के ज़रिये मशहूर हो जाती

नवाब मिर्ज़ा ख़ान दाग़ की पैदाइश 25 मई 1831 को दिल्ली के लाल चौक में हुई, उनके वालिद शहीद शमसुद्दीन अहमद पंजाब में एक छोटी सी रियासत फ़िरोज़पुर झिरका के वली थे। इनकी वालिदा वज़ीर ख़ानम उर्फ़ छोटी बेगम थीं। दाग़ जब मात्र चार वर्ष के थे तभी इनके वालिद को एक अंग्रेज़ी सिविल सर्वेंट अधिकारी विलियम फ़्रेज़र के क़त्ल के जुर्म में 8 अक्टूबर 1835 को फाॅंसी दे दी गई ,उसके बाद इनकी वालिदा का रो रो कर बुरा हाल हो गया था और वो अंग्रेज़ों के भय से कई दिनों तक छुपकर रहीं।

जो कृष्ण भक्त थे और मौलवी भी थे, और कामरेड भी

हसरत शायर तो थे ही ,संविधान सभा के सदस्य भी थे, जो यूनाइटेड प्रोविंस से चुने गए थे ,इस्लामी विद्वान,फ़लसफ़ी और कृष्ण-भक्त इनके बारे में कहा जाता है। हसरत जब भी हज की यात्रा करके लौटते थे तो सीधे मथुरा वृंदावन जाया करते थे। वो कहते थे जब तक मैं मथुरा न जाऊॅं मेरा हज किस काम का है उनके बारे में मशहूर है कि उन्होंने तेरह हज किए थे।

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