Tag : Faiz Ahmad Faiz

Blog on War

जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है

आलमे-इंसानियत की कोई भी जंग उठाकर देख लीजिए और उसके असबाब तलाशिए तो आख़िर में वाहिद सबब ताक़त का जुनून ही नज़र आएगा और इसमें अगर अना की दीवानगी भी शामिल कर ली जाए तो मुआमला और ख़तरनाक हो जाता है।

Faiz Ahmad Faiz

فیض احمد فیض نے ’مجھ سے پہلی سی محبت مری محبوب نہ مانگ‘ کس کی یاد میں لکھی تھی؟

ڈاکٹر ایوب مرزا اپنی کتاب ’ہم کہ ٹھہرے اجنبی‘ میں لکھتے ہیں کہ ’پنڈی کلب کے لان میں ایک خاموش شام میں ہم اور فیض بیٹھے تھے۔ میں نے پوچھا فیض صاحب آپ نے کبھی محبت کی ہے؟ بولے ’ہاں کی ہے اور کئی بار کی ہے۔‘

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जब फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ को इंग्लिश के पर्चे में 150 में से 165 नंबर मिले

थर्ड ईयर के इम्तिहान के बाद जब तालिब-ए-इल्म अपनी अपनी कापियाँ देख रहे थे तो फ़ैज़ की कॉपी पर 165 नंबर दर्ज थे। कोई हैरान हुए बग़ैर नहीं रह सका क्योंकि इम्तिहान सिर्फ़ 150 नंबरों का था।

Majrooh Sultanpuri, ‎मजरूह सुल्तानपुरी

मजरूह सुल्तानपुरी : जिन्हें जिगर मोरादाबादी ने फ़िल्मों में लिखने के लिए राज़ी किया

एक दिन मजरूह साहब अपने रिकॉर्ड प्लेयर में मल्लिका-ए-तरन्नुम ‘नूरजहाँ’ की गायी और फ़ैज़ साहब की लिखी नज़्म “मुझसे पहली सी मुहब्बत…” सुन रहे थे। इस नज़्म में एक मिसरा आया ‘तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है’। मजरूह साहब इस मिसरे के दीवाने हो गए और उन्होंने फ़ैज़ साहब से बात की कि वो इस मिसरे को ले कर एक मुखड़ा रचना चाहते हैं। फ़ैज़ साहब ने इजाज़त भी दे दी।

Faiz Ahmad Faiz

Faiz, Friend of My Soul

A relentless humanist, a hopeless romantic, and a heartbroken patriot, Faiz is everything that life can offer. He is no stranger to the festivities and griefs of the human. His oeuvre is the adjudicator of humanity. Faiz, to me, was the last humanist of the twentieth century who embraced everything human.

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