Tag : Sahir Ludhianvi

वो सुब्ह कभी तो आएगी

हमें पूरी उम्मीद रखनी है कि दुनिया फिर उतनी ही ख़ूबसूरत होगी जितनी इन दो बरसों पहले थी। हम उसी तरह बग़लगीर होंगे, उसी तरह हसेंगे-बोलेंगे, नाचेंगे-गाएंगे, खाऐंगे-पिऐंगे। उसी तरह शादियों में शहनाइयां और ढ़ोल-नगाड़े बजेंगे। उसी तरह महफ़िलें सजेंगी, शायरी सुनी जाएगी, मुशायरे बरपा होंगे। वैसे ही ट्रेनें खचाखच भरेंगी। भीड़ वाली जगहों पर भीड़ होगी। बाग़ों में झूले सुनसान नहीं पड़े होंगे, बच्चों के साथ गुनगुनाऐंगे, लहराएंगे।

Devendra Satyarthi

देवेन्द्र सत्यार्थी: वो आदमी जिसने हिन्दोस्तान के गाँव-गाँव जा कर लोकगीत जमा किए

एक बार साहिर लुधियानवी और देवेन्द्र सत्यार्थी लाहौर से लायलपुर जा रहे थे, लेकिन जब वो स्टेशन में दाख़िल हुए तो उन्हें मालूम हुआ कि गाड़ी पूरी तरह भरी हुई है और किसी भी डिब्बे में तिल रखने की भी जगह बाक़ी नहीं है। कुछ लोग ट्रेन की छत पर भी सवार हैं। साहिर ने… continue reading

Sahir Ludhianvi and Majaz

साहिर ने मजाज़ से क्या कहा रेलवे स्टेशन पर

साहिर उस वक़्त के बेहद मक़बूल शायर मजाज़ के साथ वर्सोवा में रहते थे। दोनों काम की तलाश में यहाँ-वहाँ जाते। एक रोज़ उन्हें कोई प्रोड्यूसर साहब मिले जो कि मजाज़ के जानने वालों में से थे। आपस में बातचीत हुई तो मजाज़ ने बताया कि हम भी बम्बई में नग़्मे लिखने आएँ हैं। वो प्रोड्यूसर साहब उस वक़्त एक फ़िल्म बना रहे थे। उन्होंने दोनों को अगले दिन अपने ऑफ़िस में बुलाया और नग़्मे की सिचुएशन दी। दोनों ने रात में वो नग़्मा पूरा किया और अगले दिन ऑफ़िस गए।

साहिर, जो हर इक पल का शाइर है

साहिर की रेंज इतनी व्यापक है कि उनके लोकप्रिय गीतों की चमक में उनके बहुत से उल्लेखनीय गीत कहीं पीछे छूट गए हैं। साहिर मुखर होते थे मगर कभी लाउड नहीं होते थे। वे गहरी बात कह जाते मगर दुरूह बनकर नहीं, बड़ी सरलता से जाने दुनिया और मन की किन गहराइयों को बयान कर जाते थे। यहाँ पर हम उनके कुछ ऐसे ही गीतों की चर्चा करेंगे जिनके बारे में अक्सर बात नहीं होती है।

Sher Unke Geet Hamare

जब शायरों के शेर ज़रा सी तब्दीली के साथ फ़िल्मों में पेश किये गए

उर्दू शायरी में किसी दूसरे शायर के कलाम, शे’र या किसी मिस्रा से मुतअस्सिर हो कर, इसमें कुछ इज़ाफ़ा करके उसको अपना लेने की रिवायत हमेशा रही है जिसे तज़मीन कहते हैं। इसके अलावा तरही मुशायरों में किसी उस्ताद की ग़ज़ल से कोई मिस्रा दिया जाता था यानी ‘मिस्रा-ए-तरह’ और सब शायर इसी ज़मीन में इसी क़ाफ़िए और रदीफ़ के साथ ग़ज़लें कहते थे और इस ‘मिस्रा-ए-तरह’ पर अपने मिस्रे से ‘गिरह’ लगाते थे।

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