Tag : Tribute

Zia Mohiuddin - Blog Cover

ضیا محی الدین: جنہوں نے صدا کاری کو فنکاری بنا دیا

ضیا محی الدین بلا مبالغہ وہ شخصیت تھے جنہوں نے صدا کاری کو ایک صنفِ سخن کے طور پر شناخت دی۔ اچھی صدا کاری اور آواز سے تاثر پیدا کرنے پر اختیار ایک صداکار کا امتیاز ہو سکتا ہے، ضیا البتہ ایسی شخصیت تھے کہ جن کا کام خود فنِ صدا کاری کے لیے باعثِ عزت قرار پایا۔

“हिंदुस्तान की हर ज़बान को एक गोपीचंद नारंग चाहिए।” कमलेश्वर

प्रोफेसर गोपीचंद नारंग साहब का जाना किसी बड़ी शख़्सियत के जाने से ज़्यादा बड़ा सानिहा इसलिए है कि गोपीचंद नारंग सिर्फ़ बड़ी शख्सियत नहीं थे बल्कि वो जिस तहज़ीब के अलम-बरदार थे वो उनके साथ चली गई है। वो तहज़ीब बहुत तेज़ी से ख़त्म होती जा रही है। वो तहज़ीब सिर्फ उर्दू ज़बान की तहज़ीब नहीं है बल्कि हिंदुस्तान की हर ज़बान की तहज़ीब है।

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लता मंगेशकर : वो आवाज़ ही हमारी पहचान है

लता मंगेशकर उस ऐतिहासिक बदलाव का हिस्सा थीं, जब सिनेमा बदल रहा था, सिनेमा का संगीत बदल रहा था। सिनेमा के पर्दे पर पारसी शैली में गीतों के नाटकीय चित्रण से अलग उनकी आवाज़ हर तरफ छाने लगी। ग्रामोफोन के रिकार्ड्स के जरिए, रेडियो के जरिए और लोगों की गुनगुनाहट के जरिए। गीत अब महज किरदार की कहानी नहीं बयान करते थे, लोगों के दिलों की आवाज़ बनने लगे।

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Lata Mangeshkar: The Immortal Voice, Immortalized

Shakeel Badayuni, Majrooh Sultanpuri, Gulzar, Jaan Nisar Akhtar, and even Naushad Sahab – calling to mind the many poets who tried to touch upon Lata Mangeshkar voice in their poems, in the end, I strongly felt that her voice always remained untouched.

दिलीप कुमार: एक ज़िन्दगी के भीतर कितनी ज़िन्दगियां…

दिलीप कुमार इकलौते अभिनेता थे कि जब कैमरे की तरफ़ पीठ होती थी तब भी वे अभिनय करते नजर आते थे। फ़िल्म ‘अमर’ में एक दृश्य में मधुबाला उनसे मुख़ातिब हैं और कहती हैं, “सूरत से तो आप भले आदमी मालूम होते हैं…” फ़्रेम में सिर्फ़ उनकी धुंधली सी बांह नज़र आती है मगर संवाद अदायगी के साथ वे जिस तरीक़े से अपनी बांह को झटके से पीछे करते हैं वह उनके संवाद “सीरत में भी कुछ ऐसा बुरा नहीं…” को और ज़ियादा असरदार बना देता है।

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