Hazrat-e-Ishq, हज़रत-ए-इश्क़

हज़रत-ए-इश्क़, जो उस्तादों के उस्ताद हैं

ज़िन्दगी बदलाव का नाम है, जड़ चीज़ों को निष्प्राण कहा जाता है। लेकिन बदलाव कई तरह का होता है, बच्चा पैदा होने के बाद बुज़ुर्ग होने तक बहुत से बदलावों से गुज़रता है, इन बदलावों की दिशा कुछ भी हो सकती है और अगर कोई राह दिखाने वाला न हो तो अक्सर दिशा उल्टी ही होती है और वो लोग, वो शय जो हमारा रुख़ हमेशा रौशनी की तरफ़ रखे, टीचर, उस्ताद या गुरु का दर्जा रखते हैं।

उस्तादों के बारे में मौला अली का क़ौल भी है कि जिससे मैंने एक हर्फ़ भी सीखा है वो मेरा उस्ताद है!

और संस्कृत में भी कहा गया है कि,

गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु गुरुर देवो महेश्वरः
गुरुः साक्षात्परब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नमः

उर्दू शायरी में शागिर्द और उस्ताद की रवायत एक लंबे अरसे से चली आ रही है, दर अस्ल अदब और कला की हर सिन्फ़ में ये परम्परा रही है चाहे वो फ़िलॉसफ़ी हो या मौसिक़ी या शायरी।

हिन्दुस्तानी तहज़ीब से वाक़िफ़ हर शख़्स ये बात जानता है कि कोई भी फ़न सीखने के लिए, इल्म हासिल करने के लिए पहले उसके लायक़ बनना ज़रूरी है, ये वो ज़मीन है जहाँ गुरुओं, उस्तादों, शिक्षकों का सम्मान करना शिक्षित होने की पहली सीढ़ी माना जाता है, ऐसे में उस्तादों का एहतराम करने की रवायत बन जाती है जो कई शेरों में झलकती है, यहाँ तक कि जो अपने वक़्त के उस्ताद माने जाते थे वो भी अपने से पहले के बड़े शायरों को ख़ूब इज़्ज़त देते थे,

रेख़्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो ‘ग़ालिब’
कहते हैं अगले ज़माने में कोई ‘मीर’ भी था

इसके साथ ही अपने उस्तादों पर फ़ख़्र भी ख़ूब किया जाता था, रासिख़ अज़ीमाबादी का ये शेर मीर के बारे में देखिए,

शागिर्द हैं हम ‘मीर’ से उस्ताद के ‘रासिख़’
उस्तादों का उस्ताद है उस्ताद हमारा

वहीं हाली जो कि ग़ालिब के शागिर्द थे, उन्होंने ग़ालिब की वफ़ात पर मर्सिया लिखा जिसके कुछ मिसरे यूँ हैं,

था बिसात ए सुख़न में शातिर एक
हमको चालें बताएगा अब कौन
शेर में ना तमाम है हाली
ग़ज़ल इसकी बनाएगा अब कौन

उस्तादों का मर्तबा शागिर्द के जीवन में अंधेरी रात में एक लौ के मानिंद होता था!

लेकिन ऐसा भी नहीं है कि हर उस्ताद एक सी इज़्ज़त पाता है, शागिर्द की क़ाबिलियत अगर उस्ताद परखता है तो उस्ताद की क़ाबिलियत शार्गिद भी देखता है, कितनी बार आपके साथ हुआ होगा कि कुछ टीचर्स बस नाम से याद रहते हैं और कुछ वो भी नहीं, मगर कुछ होते हैं जिनकी बातें, लहजा, इल्म, हर चीज़ ज़हन में ज़िन्दगी भर के लिए बस जाती है, और कई बार ऐसा भी होता है कि हमारा कोई हम उम्र दोस्त तक हमें गुरु के रूप में याद रहता है, इसकी सबसे बड़ी वज्ह है कि उस्तादों को ये एहसास होता है कि किसकी ज़िन्दगी में उन्हें कितना शामिल होना है, तराशने और हावी हो जाने का जो बारीक़ फ़र्क़ है वो ये उस्ताद ख़ूब समझते हैं और इसीलिए अपना एक स्टेटस बना कर चलते हैं, जैसे हमारे जौन साहब,

जौन जुदा तो रहना होगा तुझको अपने यारों बीच
यार ही तू यारों का नहीं है यारों का उस्ताद भी है

मगर सब उस्तादों के बाद आख़िर इंसान का अपना तज्रबा उसका सबसे बड़ा उस्ताद होता है, उसका अपना मुशाहिदा, जैसे हर इम्तिहान के लिए कहा जाता है सेल्फ़ स्टडी ज़रूरी है, मिट्टी में हज़ार पानी, खाद डालो, मिट्टी गर ज़रख़ेज़ होगी तभी हरियाली खिलेगी, इस बात को हमारे शोअरा ने ख़ूब समझा और लिखा, ग़ालिब कहते हैं कि परेशानियों के जो थपेड़े हैं वो किसी उस्ताद की मार से कम नहीं,

अहले बीनिश को है तूफ़ान ए हवादिस मकतब
लतमा ए मौज कम अज़ सेलि ए उस्ताद नहीं

ग़ालिब

देखना क्या है, नज़र अंदाज़ करना है किसे
मंज़रों की ख़ुद ब ख़ुद पहचान होती जाएगी

आते आते इश्क़ करने का हुनर आ जाएगा
रफ़्ता रफ़्ता ज़िन्दगी आसान होती जाएगी

अमीर इमाम

बस हर इल्म, हर तज्रबे की आख़िरी मंज़िल इश्क़ है, इश्क़ करना आ गया या यूँ कहें कि इश्क़ होना आ गया तो कम अज़ कम ज़िन्दगी में ज़िन्दा महसूस करने के लिए किसी इल्म की ज़रूरत नहीं, हमें अगर मालूम ही नहीं होगा कि हमारी मंज़िल क्या है तो चाहे उस्ताद भी साथ रहें, चाहे दुनियाभर के तज्रबे हमें हुए हों, हम शायद भटक ही जायेंगे इसीलिए कहा गया है कि आख़िरी मंज़िल बस इश्क़ है, इश्क़ सिर्फ़ रूमानी सा तसव्वुर नहीं है, इंसान के इंसान से, इंसान के पूरी कायनात से तअल्लुक़ का दूसरा नाम है इश्क़, जैसे कबीर कहते ही हैं,

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ,पंडित भया न कोय
ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय

और हमारे शोअरा ने भी संत कबीर की ही हाँ में हाँ मिलायी है, वो मानते हैं कि इश्क़ अपने आप में इल्म की इंतहा है, ये ऐसा उस्ताद है, ऐसा निसाब है कि दुनिया भर का इल्म और किताबें धरी की धरी रह जाती हैं!

वो अजब घड़ी थी मैं जिस घड़ी लिया दर्स नुस्ख़ा ए इश्क़ का
कि किताब अक्ल की ताक़ पर ज्यूँ धरी थी त्यूं ही धरी रही

सिराज औरंगाबादी

है और इल्म ओ अदब मकतब-ए-मोहब्बत में
कि है वहाँ का मोअल्लिम जुदा अदीब जुदा

चकबस्त

तो आज के दिन, ये तय किया जाए कि हम मोहब्बत के मकतब में हैं जहाँ पूरी दुनिया हमारी सहपाठी है, हमें ता उम्र बस इस एक सबक़ को हर फ़र्द से मिलने पर दोहराना है,

इक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत का अदना ये फ़साना है
सिमटे तो दिल-ए-आशिक़ फैले तो ज़माना है

जिगर