बात से बात चले!

धीरेंद्र सिंह फ़य्याज़ के साथ एक अदबी गुफ़्तुगू

आग़ाज़ हम आप के ख़ानदानी पस-मंज़र से करेंगे, क्या आप के घर में शा’इरी और अदब का माहौल था, जिस से प्रभावित हो कर आप भी शे’र की तरफ़ माइल हुए। इस के बारे में कुछ हमें बताइए।

नहीं ! मेरे परिवार का दूर- दूर तक शा’इरी तो क्या किसी भी क़िस्म की आर्ट से कोई तअल्लुक़ नहीं रहा लेकिन मेरे माँ- बाप को इस बात से भी कोई ऐ’तराज़ नहीं रहा कि उनके बच्चों की शा’इरी या मौसिक़ी की जानिब कोई दिलचस्पी क्यों है बल्कि उन्होंने हमेशा अपने बच्चों को वो करने दिया जो वो करना चाहते थे.
शा’इरी की जानिब मेरी दिलचस्पी एक इत्तेफ़ाक़ थी और उसका सिलसिला तब शुरूअ हुआ जब मेरे पिता घर में टेपरिकॉर्डर लेकर आए और हमें अच्छे गाने सुनने की आज़ादी थी. घर में अख़बार आता था और तब अख़बार में अच्छी- सच्ची ख़बरों के साथ- साथ अच्छा साहित्य भी पढ़ने को मिल जाता था बावजूद इसके अगर मैं कोई किताब या रिसाला पढ़ना चाहता था तो माँ- बाप ने पैसे देने में कभी कोई आना- कानी नहीं की बल्कि हमारी अंग्रेज़ी भी अच्छी हो इसके बाइस एहतियातन घर में ‘द क्रॉनिकल’ अख़बार भी मँगवाया जाता था.

आप एक इंजीनियर हैं, और स्कूल में साइंस पढ़ी है, मगर ज़बान और लफ़्ज़ों की सुन्दरता में आप की दिलचस्पी क्योंकर हुई। आम तौर पर कहा जाता है कि साइंस और अदब दो मुतज़ाद रास्ते हैं, हमें उम्मीद है कि आप ऐसा नहीं समझते होंगे।

मेरा अपना मानना है कि साइंस हो कि कुछ हो हर चीज़ की इन्तेहा आर्ट होती है. मैं एक वैज्ञानिक को भी कलाकार के रूप में देखता हूँ. जिस तरह से एक कलाकार चाहे वो शा’इर हो, मुसव्विर हो, गायक हो या अदाकार हो वह हमेशा कुछ नया खोजने- करने की तलाश में रहता है ठीक उसी रास्ते पर विज्ञान भी चलता चला आ रहा है. एक आम आदमी कभी नहीं सोचता कि पेड़ से सेब का फल नीचे ज़मीन पर ही क्यों गिरा आसमान की जानिब क्यों नहीं उड़ गया.

आप इंदौर के नवाही इलाक़े से तअल्लुक़ रखते हैं। वहाँ ज़बान और ख़ास तौर पर फ़ोक का बड़ा असर होगा , इस शहर के बारे में कुछ बताएँ। शायरी में आप के उस्ताद कौन थे।

इंदौर के मुताल्लिक़ मैं मुख़्तसर यही कहूँगा कि यह शहर ख़ुश- मिज़ाज लोगों का शहर है. इंदौर वही ज़मीन है जहाँ ‘एम. एफ़. हुसैन’ और उस्ताद ‘अमीर ख़ान साहब’ जैसे बड़े कलाकारों का जन्म हुआ. फिर इंदौर से तअल्लुक़ रखने वाले शा’इर ‘राहत इंदौरी’ साहब को कौन नहीं जानता. इंदौर वह शहर है जहाँ कलाकारों से ज़ियादा कलाकारों को प्रोत्साहन देने वाले लोग रहते हैं. यहाँ आज भी कोई सांस्कृतिक गतिविधि होने पर बैठने की जगह कम पड़ती ही पड़ती है.
रही बात मेरे उस्ताद की तो मैं यही कहना चाहूँगा कि अगर कोई आपका उस्ताद नहीं बनना चाहता तो आप किताबों को अपना उस्ताद बना लीजिए. सीखने- समझने में वक़्त लगता है लेकिन एक वक़्त के बा’द आप सीख ही जाते हैं कि आपने कितना सीखा है, कितना और सीखना है और कैसे सीखना है.

आप की शा’इरी में क्राफ़्ट का बहुत दख़्ल है, आप शा’इरी में क्राफ़्ट की क्या अहमियत महसूस करते हैं।

मेरी या किसी की भी शा’इरी हो उसमें क्राफ़्ट का दख़्ल लाज़िमी है बल्कि शा’इरी ही क्या दुनिया में मौजूद हर कला का अपना एक क्राफ़्ट होता है. संगीत में सुर हैं जिससे सुरीले- बेसुरे की शिनाख़्त होती है. आप कुछ भी गाकर उसे संगीत नहीं कह सकते वर्ना मुझे नहीं लगता कि दुनिया में साँस लेने वाला कोई भी शख़्स ऐसा होगा जो अच्छा- बुरा किसी भी तरह से गाता न हो ऐसे में वह गायक नहीं हो जाता. पेंटिंग में रंग हैं रंगों की समझ है. कैनवास पर रंग फैला देने से पेंटिंग नहीं बनती. आप यह नहीं कह सकते कि आपको डॉक्टर बनना है लेकिन साइंस नहीं पढ़नी है. आप बग़ैर ता’लीम- तर्बियत के हवाई- जहाज़ कैसे उड़ा सकते हैं. यही शा’इरी के साथ है लिहाज़ा शे’र कहने से क़ब्ल हमें उसके क्राफ़्ट का इल्म होना बेहद ज़रूरी है. क्राफ़्ट बुनियाद है और बग़ैर बुनियाद के किसी भी इमारत की ता’मीर का तसव्वुर नहीं किया जा सकता.

वो कौन से शा’इर हैं जिन्हें पढ़ कर आप बहुत प्रभावित हुए?

जब बात सिर्फ़ अच्छे गाने सुनने तक महदूद थी तब मुझे ‘साहिर’, ‘मजरूह सुल्तानपुरी’, ‘कैफ़ी आज़्मी’ और ‘गुलज़ार’ बहुत प्रभावित करते थे, आज भी करते हैं. धीरे- धीरे जानकारी बढ़ी तो मुतालए में भी इज़ाफ़ा हुआ. बहुत से शाइर पढ़े जिनमें ‘ग़ालिब’, ‘मीर’, ‘नासिर काज़मी’, ‘फ़िराक़’ ने मुझे बहुत प्रभावित किया.
मौजूदा दौर के शोअरा में मुझे ‘भारत भूषण पन्त साहब’ बहुत पसन्द रहे हैं. ऐसे कम ही शा’इर होते हैं जिनकी किसी ग़ज़ल का हर एक शे’र उतना ही अच्छा होता है जितना उसे होना चाहिए.

आप शा’इरी के साथ साथ एक नॉवेल भी लिख चुके हैं, नस्र की तरफ़ आप कैसे माइल हुए, और शा’इरी लिखने / समझने में फ़िक्शन का क्या किरदार है।

दरअस्ल मैं शा’इरी से नस्र की तरफ़ नहीं बल्कि नस्र से शा’इरी की तरफ़ माइल हुआ. फ़िक्शन पढ़ने का शौक़ कब जूनून की हदें पार कर गया और कब मैंने नावेल लिख दिया इसकी मुझे भनक भी नहीं लगी. फ़िक्शन के साथ- साथ सालों- साल तक मैंने शा’इरी भी पढ़ी. धीरे- धीरे शे’र कहने शुरूअ किए उसकी ग्रामर के बारे में जानने- समझने की कोशिश की और फिर आहिस्ता- आहिस्ता ग़ज़लें कहने लगा. मैंने अपनी पहली कविता नवीं कक्षा में लिखी थी जो आजतक मैंने किसी को नहीं पढ़वाई (यह लिखते हुए मेरे चेहरे किस दर्जा मुस्कान खिंच आई है मैं बता नहीं सकता)
किसी भी लेखक या शा’इर के लिए फिक्शन पढ़ना बहुत ज़रूरी है. फ़िक्शन एक प्रोसेस है और शा’इरी उसका निचोड़. हम किसी कहानी का सार दो मिसरों में तभी लिख सकते हैं जब हमने पूरी कहानी पढ़ी हो.

आप अरूज़ और बहर में ख़ास दिलचस्पी रखते हैं, आप के शागिर्दों की तादाद भी सैकड़ों में है, आप का मैलान इस तरफ़ कैसे हुआ। और अब तो उस्तादी / शागिर्दी का रिश्ता भी वैसा नहीं रहा जैसा दाग़ के ज़माने में था।

मैं कोई उस्ताद नहीं हूँ बल्कि आप यह कह सकते हैं कि मैं वो जिज्ञासु और उत्साही विद्यार्थी हूँ जो कुछ भी जानने- सीखने के बा’द पूरी दुनिया को बता देना चाहता है कि उसने क्या सीखा है. अब मेरी इस हरकत से कितने लोग फ़ैज़याब होते हैं इसका मुझे कोई अन्दाज़ा नहीं है.
मैं नाम तो नहीं लूँगा लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो मुझे ‘अपने उस्ताद’ की हैसियत से नवाज़ते हैं लेकिन यह भी उनकी अपनी ज़िद है.
उस्तादी- शागिर्दी का रिश्ता कैसा होगा यह उस्ताद और शागिर्द दोनों पर निर्भर करता है. कई जगह उस्ताद शागिर्द को उचित ता’लीम नहीं देते तो कई जगह शागिर्द उस्ताद की न इज़्ज़त करते हैं और न ही उनकी दी हुई नसीहतों पर अमल करते हैं. मुझे एक वाक़िआ याद आता है जो मैंने ख़ुद ‘जावेद अख़्तर साहब’ की ज़बान से सुना है कि ‘मुज़्तर ख़ैराबादी’ ‘अमीर मीनाई’ को सिर्फ़ इसीलिए तमाम उम्र अपना उस्ताद कहते रहे क्यों कि ‘अमीर मीनाई’ ने उनके किसी एक शे’र के एक मिसरे पर इस्लाह फ़रमाई थी. हर रिश्ते में आपकी नीयत का साफ़ होना बहुत ज़रूरी है फिर चाहे वह उस्ताद की नीयत हो या कि शागिर्द की. सारे सीखने- सिखाने वाले एक से नहीं होते. मैं ख़ुश- नसीब हूँ कि मेरे शागिर्द मेरी बताई बातों को ध्यान से सुनते हैं और उन पर अमल भी करते हैं.
कुछ भी सीखने के लिए आपको एक वक़्त के बा’द किसी न किसी पर यक़ीन करना ही होता है चाहे फिर वो किताबें हों या फिर कोई उस्ताद.

शायद आप नए लोगों के लिए अरूज़ पर एक किताब भी लिख रहे हैं, मुख़्तसरन उस के बारे में बताइए।

बाज़ लोग जो उर्दू शाइ’री में अच्छी- ख़ासी दिलचस्पी रखते हैं, शे’र या ग़ज़ल कहना चाहते हैं, लेकिन उसकी रस्मुल- ख़त से वाक़िफ़ नहीं हैं (जबकि यह बेहद ज़रूरी है कि आप जिस ज़बान में शाइरी करना चाहते हैं आपको उस ज़बान और उसकी रस्मुल- ख़त से वाक़िफ़ होना ही चाहिए. आपने कभी सुना है कि फ़लाँ को फ़्रेंच नहीं आती लेकिन वह फ़्रेंच का बहुत बड़ा शा’इर है? शाएद नहीं.)
इसी लिहाज़ से और इसी डर के बाइस कि कहीं उर्दू रस्मुल-ख़त न आने के सबब वो शाइ’री करना ही न बन्द कर दें, मैंने अरूज़ के मुताल्लिक़ सोशल मीडिया में लिखना शुरूअ किया और फिर तमाम बिखरे हुए माल को यकजा करके किताब की शक्ल दे दी. उम्मीद है देवनागरी में अरूज़ पर लिखी गई यह किताब बहुत जल्द मंज़र- ए- आम पर आ जाएगी.

आप नए शे’र कहने वालों को अरूज़ सिखाते हैं और उन्हें शे’र की बारीकियाँ समझाते हैं, इस में आप को कितनी कामियाबी मिली है।

बहुत हद तक, एक साल पहले जो लोग रदीफ़- क़ाफ़िए की अहमियत तक से वाक़िफ़ नहीं थे वो आज बा- क़ाएदा बहर में शे’र कह रहे हैं बल्कि अच्छे शे’र कह रहे हैं या’नी मैं बेझिझक होकर ये कह सकता हूँ कि इस सिलसिले में मैंने जितनी कामियाबी हासिल की है वो मेरी मेहनत से कई गुना ज़ियादा है.

शे’र कहने के लिए अरूज़ जानना ज़रूरी नहीं होता, मगर अरूज़ का इल्म शे’र कहने में कितनी मदद कर सकता है।

बेशक, शे’र कहने वाला पहले शे’र कहता है. फिर उसे रदीफ़ क़ाफ़िए का इल्म होता है, फिर बहर का फिर वो अच्छे और बुरे और ठीक- ठाक शे’र में फ़र्क़ करना सीखता है. यह एक नेचुरल सिलसिला है. लेकिन जैसा कि मैंने पहले ही कहा है कि अरूज़ शे’र कहने की बुनियादी ज़रूरत है और बुनियाद फिर बुनियाद ही होती है.

आप ज़बान, शा’इरी, और उर्दू के मुस्तक़बिल को किस तरह देखते हैं।

उर्दू ज़बान और उर्दू शाइ’री की तवारीख़ जितनी रौशन है उतना ही रौशन उसका मुस्तक़बिल है. आज उर्दू शाइ’री की जानिब युवा वर्ग की दिलचस्पी देखते ही बनती है.
रेख़्ता फाउण्डेशन भी इस बात के लिए मुबारकबाद की मुस्तहिक़ है कि उसने तमाम उर्दू शाइ’री को अपनी वेबसाइट के ज़रीए बेहद आसानी से लोगों तक पहुँचाया है. उर्दू के हवाले से रेख़्ता की जानिब से किया जाने वाला हर काम क़ाबिल- ए- सताइश है.

शा’इर अपनी शैली से पहचाना जाता है। लेकिन क्या यही पहचान उसके लिए मुश्किल खड़ी नहीं करती या’नी अगर वो उससे हटकर शे’र कहता है तो यह ख़दशा भी लगा रहता है कि कहीं उसे अस्वीकार न कर दिया जाए। आपकी इस बारे में क्या राय है?

बेशक ऐसा होता है, लेकिन शाइ’र ऐसा सोचता कब है कि उसे स्वीकारा जाएगा या नकारा जाएगा. तमाम कलाकारों के बीच शाइ’र की क़ौम सबसे ज़िद्दी क़ौम होती है.
एक अच्छे शाइ’र का लहजा उसकी एक उम्र की मश्क़ का नतीजा होता है जब वो यह तय कर चुका होता है कि उसे किन अल्फ़ाज़ का इस्ते’माल करना है, कैसे इस्ते’माल करना है और कैसे अपने ख़याल को शे’र की शक्ल में पिरोना है. अब अगर वह इसमें कुछ रद्दो- बदल चाहता है तो यह उसका ज़ाती फ़ैसला है. उसे ऐसा करते वक़्त न ही सोचना चाहिए न ही डरना चाहिए.
वही ग़ालिब
(नक़्श- ए- नाज़- ए- बुत- ए- तन्नाज़- ब- आग़ोश- ए- रक़ीब
पा- ए- ताऊस पा- ए- ख़ामा- ए- मानी माँगे)
जैसे पेचीदा शे’र के लिए भी जाने जाते हैं वही ग़ालिब-
(दिल- ए- नादाँ तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है)
जैसे सहल और आम- फ़हम शे’र के लिए भी जाने जाते हैं.

आप सोशल मीडिया पर भी रहते हैं। सोशल मीडिया ने शा’इरी को किस प्रकार प्रभावित किया है।

समझदार आदमी आसानी से किसी चीज़ से प्रभावित नहीं होता और यह हमेशा आप पर निर्भर करता है कि आप किसी माध्यम से अपने लिए अच्छा चुनना चाहते हैं या ख़राब. सोशल मीडिया में अच्छी शाइ’री भी पढ़ने को मिल रही है और ख़राब भी. मैं अच्छी पढ़कर ख़ुश हूँ.

नए लिखने वालों से आप क्या कहना चाहेंगे?

नए लिखने वालों से मैं इतना ही कहूँगा कि ज़ियादा से ज़ियादा मुतालआ करें, ज़बान सीखें, ज़बान का इस्ते’माल सीखें, घबराएँ नहीं, जल्दबाज़ी से परहेज़ करें, अपने उस्ताद की इज़्ज़त करें, उनकी बताई राह पर चलने की कोशिश करें और अपनी कोशिशों में इज़ाफ़ा करें. शे’र कहना इतना भी मुश्किल नहीं है कि कोई चाहे और कह न पाए.