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Nuqta

उर्दू शब्दों पर नुक़ता क्यों ज़रूरी है

जिन दिनों हिन्दी-उर्दू विवाद ज़ोरों पर था और अदालतों की भाषा उर्दू हो गई, अख़बारात भी उर्दू में ही शाए’ होते तो एक बड़ी ता’दाद में लोग जिन्हें उर्दू की रस्म-उल-ख़त सीखने में दिक़्क़त हो रही थी, उनके लिए राजा शिवप्रसाद सितारे ‘हिन्द’ ने कोशिश की कि ज़बान उर्दू ही रहे और वो नागरी लिपि में लिखी जाए। उन्होंने कहा फ़ारसी की सभी ध्वनियाँ देवनागरी में व्यक्त होनी चाहिए। जब उन्हें पता चला कि फ़ारसी की पाँच ध्वनियाँ (क़, ख़, ग़, ज़, फ़) नागरी में नहीं हैं तो उन्होंने अक्षर के नीचे नुक़्ता लगाने का सुझाव दिया।

Ibn-e-Safi

اردو کا اگاتھا کرسٹی ۔ابنِ صفی(1980-1928)

ابنِ صفی میری معلومات کی حد تک وہ واحد ادیب ہیں جنکا یومِ پیدائش اور یومِ وفات ایک ہی ہے،یعنی 26جولائی ،اس طرح ہم کم سے کم دو برسیاں منانے سے بچ گئے۰انکی زندگی کے ہر گوشے پر اتنا کچھ لکھا جا چکا ہے کہ مجھ سے کم علم کو خامہ فرسائی کرنے کی ضرورت نہیں ہے،لیکن چونکہ ،بچپن میں اولین نقوش انہیں کی تحریروں سے ذہن پر ثبت ہوئے ہیں،

Ghalib

ग़ालिब के दीवान का दिलचस्प क़िस्सा

ये बात तो तय है के ग़ालिब ख़ुद चाहे क़र्ज़ और ग़रीबी की ज़िन्दगी गुज़ार कर मरा हो, मगर उसने अपने मरने के बाद बहुत से लोगों को अमीर क्या बल्कि रईस बना दिया।

Bhartendu Harishchandra blog

35 साल का जीवन मिला मगर बड़ा काम कर गए

भारतेन्दु हरिश्चंद्र को हिंदी अदब की दुनिया में एक हमा-दाँ अदीब के तौर पर बेपनाह शोहरत और मक़बूलियत हासिल है। बेशक भारतेन्दु ने हिंदी अदब में एक लासानी मक़ाम हासिल किया, लेकिन आपका क़लम सिर्फ़ एक मख़सूस ज़बान तक महदूद नहीं रहा। आपने कई दीगर ज़बानों में अपना क़लम चलाया, लेकिन आपकी उर्दू तसानीफ़ वाक़ई क़ाबिल-ए-ज़िक्र हैं।

Nazeer Akbarabadi

नज़ीर अकबराबादी: देसी मिट्टी की ख़ुश्बू

वली मोहम्मद नाम के गुमनाम शाइर अवाम के गीत गा रहे थे। कभी ककड़ी खीरा बेचने वाले के लिए नज़्म लिख देते तो कभी लड्डू बेचने वाले के लिए इस से ये हुआ कि लोग इन्हें बाज़ारी शाइर कहने लगे। पूरा नाम शेख़ वली मोहम्मद था लेकिन नज़ीर अकबराबादी के नाम से शोहरत पायी । इनका जन्म दिल्ली में 1735 के आसपास शेख़ मुहम्मद फ़ारूक़ के घर हुआ।

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