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Mushaira and poets

क्या रहा है मुशायरे में अब

शायरी और अदब के चाहने वाले कभी भी एक ही शायर या अदीब को लेकर नहीं बैठते, ये तो मुमकिन है कि कोई एक अदीब उन्हें ज़ियादा पसंद हो, मगर ऐसा नहीं होता कि वो किसी और को न पढ़ें, मीर के आशिक़ ग़ालिब के भी दीवाने हो सकते हैं, जौन को चाहने वाले फ़ैज़ की नज़्में भी गुनगुनाते हुए मिल जाते हैं।

Maihar-1

मैहर : जहाँ अतीत मौजूदा वक़्त के साथ-साथ चलता है

मेरे लिए मैहर आना दरअसल मेरे बचपन के नास्टेल्जिया से जुड़ा था। बहुत साल पहले की बात है। तब मैं नौ बरस की उम्र में पिता के साथ उस पहाड़ की पथरीली ऊँची-नीची सीढ़ियाँ चढ़कर मंदिर तक पहुँचा था। माँ पीछे छूट गई थीं। ऊँचाई पर तेज हवा चल रही थी और मेरे कपड़े फड़फड़ा रहे थे। तब पिता के साथ मैंने ऊपर रेलिंग से झाँका था।

Urdu Script, Urdu Lipi

उर्दू लिपि के कुछ बारीक मसअले

किसी भी ज़बान को पूरी तरह से समझने के लिए, उसके एक-एक लफ़्ज़ के मआनी तक पहुँचने के लिए सबसे पहले ज़रूरी है, कि हमें उस ज़बान की रस्मुल- ख़त या’नी लिपि (script) का इल्म होना चाहिए। जब तक हम कोई ज़बान अच्छी तरह पढ़ और लिख नहीं सकते, हम उस ज़बान से पूरी तरह वाक़िफ़ नहीं हो सकते।

Lal Qila 1960 movie blog

लाल क़िला फ़िल्म आज भी हमें अपने असर में रक्खे हुए है

ख़ूबसूरत मुकालिमों से आरास्ता 1960 में मंज़र-ए-आम पर आयी फ़िल्म “लाल क़िला” सिर्फ़ लाल क़िले और हिन्दोस्तान के आख़िरी ताजदार बहादुर शाह ज़फ़र की कहानी नहीं है, बल्कि उस शरारे की कहानी है जो ज़ुल्म और इस्तेहसाल की हवा पा कर 1857 में एक शोले की शक्ल इख़्तियार कर गया।

Bollywood and Urdu

जब महबूबा को मर्डरर के बजाए क़ातिल कहा जाए

उर्दू की तारीफ़ बयान करने के लिए मेरे पास सिर्फ़ एहसासात ही हैं क्यों कि ये काम लफ़्ज़ों को नहीं दिया जा सकता। मैं यक़ीन से कह सकता हूँ कि अगर उर्दू बॉलीवुड का हिस्सा न होती तो ऐसी फ़िल्में, ग़ज़लें, नग़्में, डायलॉग्स का हमारी ज़िंदगी पर कोई ख़ास असर न होता।

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