Ibn-e-Safi

اردو کا اگاتھا کرسٹی ۔ابنِ صفی(1980-1928)

ابنِ صفی میری معلومات کی حد تک وہ واحد ادیب ہیں جنکا یومِ پیدائش اور یومِ وفات ایک ہی ہے،یعنی 26جولائی ،اس طرح ہم کم سے کم دو برسیاں منانے سے بچ گئے۰انکی زندگی کے ہر گوشے پر اتنا کچھ لکھا جا چکا ہے کہ مجھ سے کم علم کو خامہ فرسائی کرنے کی ضرورت نہیں ہے،لیکن چونکہ ،بچپن میں اولین نقوش انہیں کی تحریروں سے ذہن پر ثبت ہوئے ہیں،

Best Quotes of Premchand

प्रेमचंद की वो बातें जो हमेशा जीवन में नई रौशनी भरती हैं

प्रेमचंद पिछले सौ बरसों से तमाम तरह के अदबी-ओ-समाजी डिस्कोर्स के माध्यम से हमारे ज़हनों में मौजूद रहे हैं। यहाँ हम ख़ास आपके लिए प्रेमचंद के रचना-संसार से कुछ ऐसे चुनिंदा उद्धरण पेश कर रहे हैं जो न सिर्फ़ साहित्य को समझने में बल्कि जीवन के लिए भी रौशनी का स्रोत साबित होंगे।

Zabaan ke bhi pair hote hain-01

ज़बान के भी पैर होते हैं

उर्दू के सबसे बलन्द क़िले लखनऊ और दिल्ली में तामीर हुए। हिन्दवी के बाद यह दो शक्लों में तब्दील हुई जिनमें से एक हिन्दी के नाम से जानी गई जिसकी लिपि संस्कृत की लिपि यानी देवनागरी है और दूसरी उर्दू जिसकी लिपि फ़ारसी की लिपि है जिसे नस्तालीक़ कहा जाता है। उर्दू के हक़ में मैं इससे मुफ़ीद जुमला कुछ नहीं समझता कि उर्दू आम आदमी की ज़बान है। और आम आदमी के करोड़ों चेहरे करोड़ों मुँह हैं और जितने मुँह उतनी बातें।

Night Shayari, Shayari on night, A Metaphor to a Hundred Colours

Night- A Metaphor to a Hundred Colours

Ghalib, unconventionally romantic in his couplets, portrays night as the darkness in which the beloved shines. Perhaps it’s only the bewitching scattered tresses which deceive the lover into thinking that he alone enjoys sleep, peace and the night!

gandhi ji ki urdu aur urdu ke gandhi ji

गांधी जी की उर्दू और उर्दू के गांधी जी

जहाँ गांधी जी उर्दू से मुहब्बत करते थे और उर्दू में अपनी बातें करते भी थे और अक्सर लिखते भी थे, इसी तरह गांधी जी की शख़्सियत से मुतअस्सिर हो कर उस वक़्त के शायर और अदीब भी उर्दू में अदब तख़्लीक़ कर रहे थे। वो दौर उर्दू और उर्दू में लिखने वालों के लिए सुनहरी दौर इस लिए भी था कि उर्दू किसी मज़हब या क़ौम की ज़ुबान नहीं हुआ करती थी और उर्दू बोलने वालों को, लिखने वालों को इज्ज़त और मोहब्बत की नज़र से देखा जाता था।

Majrooh Sultanpuri, ‎मजरूह सुल्तानपुरी

मजरूह सुल्तानपुरी : जिन्हें जिगर मोरादाबादी ने फ़िल्मों में लिखने के लिए राज़ी किया

एक दिन मजरूह साहब अपने रिकॉर्ड प्लेयर में मल्लिका-ए-तरन्नुम ‘नूरजहाँ’ की गायी और फ़ैज़ साहब की लिखी नज़्म “मुझसे पहली सी मुहब्बत…” सुन रहे थे। इस नज़्म में एक मिसरा आया ‘तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है’। मजरूह साहब इस मिसरे के दीवाने हो गए और उन्होंने फ़ैज़ साहब से बात की कि वो इस मिसरे को ले कर एक मुखड़ा रचना चाहते हैं। फ़ैज़ साहब ने इजाज़त भी दे दी।

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