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کون ہے یہ گستاخ؟

سن 1933 میں زندگی نے رخ موڑا اور منٹو کی ملاقات عبدالباری علیگ نام کے ایک شخص سے ہوئی، جو پیشے سے اسکالر اور ادیب تھے۔ اُنہوں نے ہی منٹو کو منٹو سے ملایا، اُن کی ادب میں دلچسپی پیدا کی اور انہیں روسی و فرینچ ادب پڑھنے کی نصیحت کی۔ منٹو نے اُن کی بات کو سنجیدگی سے لیا اور روسی و فرینچ ادب پڑھنا شروع کر دیا۔

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उर्दू सहाफ़त की दो सदियाँ

साल 2022 उर्दू सहाफ़त के हवाले से इंतिहाई अहम साल है। इस साल उर्दू ज़बान की सहाफ़त अपनी ‘उम्र के दो सौ साल मुकम्मल कर रही है। 27 मार्च 1822 को कलकत्ता से उर्दू का पहला अख़बार “जाम-ए-जहाँ-नुमा” जारी हुआ था। लिहाज़ा मार्च का महीना उर्दू सहाफ़त की दो सौ साला तक़रीबात का महीना है।

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उर्दू सहाफ़त की कहानी

यूँ तो उर्दू सहाफ़त के आग़ाज़ का सेहरा हफ़्तावार ‘जाम-ए-जहाँ-नुमा’ के सर बाँधा जाता है, जो पंडित हरिहर दत्त ने 1822 में कलकत्ता से शाए’ किया था, लेकिन उस से क़ब्ल उर्दू हल्क़ों में ये बहस भी छिड़ चुकी है कि उर्दू का पहला अख़बार शे’र-ए-मैसूर टीपू सुल्तान ने 1794 में जारी किया था।

Kamal Amrohi

आई ज़ंजीर की झनकार

कमाल अमरोही अपने तरीके से जिए। अपने तरीके से फिल्में भी बनाईं, एक लंबे जीवन में सिर्फ चार फिल्मों का निर्देशन किया। ‘पाकीज़ा’ और ‘रज़िया सुल्तान’ इन दो फिल्मों को बनाने में इतना लंबा वक्त लिया कि इंडस्ट्री में बहुत से लोगों का कॅरियर भी उससे छोटा हुआ करता है। बचपन में एक बार अपनी अम्मी के डाँटने पर उन्होंने वादा किया कि वह किसी दिन मशहूर होंगे और उनके पल्लू को चाँदी के सिक्कों से भर देंगे।

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ये चराग़ बुझ रहे हैं

पाकीज़ा फिल्म में जब मीना कुमारी राजकुमार से कहती है, “आप आ गए और आप की दिल की ध़डकनों ने मुझे कहने भी नहीं दिया कि मैं एक तवायफ हूं…” तो पूरा शॉट फ्रीज हो जाता है। इसके तुरंत बाद शायद हिंदी सिनेमा के सबसे रोमांटिग गीतों में एक एक “चलो दिलदार चलो, चांद के पार चलो” शुरू होता है। यह एक पूरी सीक्वेंस है: तवायफ होने की सच्चाई के आगे राजकुमार के रूमानी प्रेम का चटख जाना, शॉट फ्रीज होना और फिर रूमानियत का चरम, जो इस दुनिया के पार जाने की बात करता है।

Kamal Amrohi

आ भी जा मेरी दुनिया में

कमाल अमरोही की फिल्मों पर चर्चा करते वक्त दो ऐसी फिल्मों पर बात करना जरूरी है, जिनको उन्होंने निर्देशित नहीं किया है मगर उन पर कमाल अमरोही की छाप स्पष्ट देखने को मिलती है। ये दो फिल्में हैं ‘दिल अपना और प्रीत पराई’ (1960) और ‘शंकर हुसैन’ (1977)। गौर करें तो कमाल अमरोही की प्रोड्यूस और किशोर साहू द्वारा निर्देशित फिल्म ‘दिल अपना और प्रीत पराई’ में उदासी के अद्भुत शेड्स देखने को मिलते हैं।

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