Ibn-e-Safi

اردو کا اگاتھا کرسٹی ۔ابنِ صفی(1980-1928)

ابنِ صفی میری معلومات کی حد تک وہ واحد ادیب ہیں جنکا یومِ پیدائش اور یومِ وفات ایک ہی ہے،یعنی 26جولائی ،اس طرح ہم کم سے کم دو برسیاں منانے سے بچ گئے۰انکی زندگی کے ہر گوشے پر اتنا کچھ لکھا جا چکا ہے کہ مجھ سے کم علم کو خامہ فرسائی کرنے کی ضرورت نہیں ہے،لیکن چونکہ ،بچپن میں اولین نقوش انہیں کی تحریروں سے ذہن پر ثبت ہوئے ہیں،

Urdu Shayari

क्या शायरी परफ़ॉर्मिंग आर्ट है

आज डिजिटल दौर में ‘शायर बनना’ वाकई बहुत आसान हो गया है | शायरी में करियर ढूँढने से पहले अपनी शायरी का उद्देश्य ढूँढना एक ज़रूरी काम है | इस काम में जीवन गुज़र जाने जैसी बात है | रिल्के कहते हैं कि हम जीवन भर शायरी करते रहते हैं और अंत में पता चलता है कि हमने जीवन भर में एक नज़्म कही | बात सिर्फ़ उद्देश्य पर भी ख़त्म नहीं होती |

Urdu ka safar

जब उर्दू ने मेरा माथा चूमा और मेरी आँख खुल गई

जब से मैंने उर्दू की उँगली पकड़ी है मैं एक दिन को भी सुस्ता नहीं सका हूँ। तेज़-गाम उर्दू की उँगली पकड़ के सफ़र करते रहना ख़ुशी के एहसास में इज़ाफ़ा करता है, लेकिन मेरी थकान का क्या? उर्दू मेरी थकान को अच्छी तरह समझती है। मैं उसे देखता हूँ और वो मेरे थके-माँदे बदन को अज़-जबीं ता- ब- पा देखती है। देख कर बड़ी चालाकी से मेरी हालत-ए-हाल को दर-गुज़र करके वापस चलने लगती है।

Urdu zabaan

ज़बान और इश्क़ किसी तरह की पाबन्दियाँ पसन्द नहीं करते

ज़बान और इश्क़ किसी तरह की पाबन्दियाँ पसन्द नहीं करते, कितनी अजीब बात है कि लफ़्ज़ ‘मजनूँ’ पागल के अर्थ में है, क़ैस इश्क़ में पागल हुआ तो उसे मजनून या मजनूँ बोलने लगे, लेकिन जज़बा-ए-इश्क़ इस क़दर ग़ालिब और ज़ाहिर था कि क़ैस की वज्ह से इस लफ़्ज़ में रफ़ता रफ़ता इश्क़ का मफ़हूम समाता चला गया और डिक्शनरी बग़लें झाँकते रह गई।

वो सुब्ह कभी तो आएगी

हमें पूरी उम्मीद रखनी है कि दुनिया फिर उतनी ही ख़ूबसूरत होगी जितनी इन दो बरसों पहले थी। हम उसी तरह बग़लगीर होंगे, उसी तरह हसेंगे-बोलेंगे, नाचेंगे-गाएंगे, खाऐंगे-पिऐंगे। उसी तरह शादियों में शहनाइयां और ढ़ोल-नगाड़े बजेंगे। उसी तरह महफ़िलें सजेंगी, शायरी सुनी जाएगी, मुशायरे बरपा होंगे। वैसे ही ट्रेनें खचाखच भरेंगी। भीड़ वाली जगहों पर भीड़ होगी। बाग़ों में झूले सुनसान नहीं पड़े होंगे, बच्चों के साथ गुनगुनाऐंगे, लहराएंगे।

आइये ! देखते हैं कि शायरों ने ख़्बाव को किस तरह बरता है

हमारा ख़्वाब वो जगह है जहाँ हमारी इजाज़त के बिना कोई भी दाख़िल नहीं हो सकता है | वहाँ बस वही आ सकते हैं जिन्हें हमारा प्यार हासिल है, जो बातें हक़ीक़त से जितनी दूर हों, वो ख़्वाबों में उतनी ही क़रीब हो जाती हैं |

Twitter Feeds

Facebook Feeds