Baat karna ya baat karni, बात करना या बात करनी

बात करना या बात करनी – दिल्ली और लखनऊ वालों का मसअला

एक दोस्त का सवाल है कि क्या ये जुमला दरुस्त है “मुझे बात बताना है ” या ये सही है “मुझे एक बात बतानी है” ऐसे ही “बात करना” होना चाहिए या “बात करनी” अस्ल में उनके सवाल की वजह उनका ये ख़्याल है कि चूँकि लफ़्ज़ ‘बात’ मोअन्नस (Feminine ) है तो इसके साथ… continue reading

स्वतंत्रता आंदोलन: जब दुबले-पतले हसरत जेल में चक्की पीसने पर लगा दिए गए

आज़ाद मुलक के अपने ख़्वाब के लिए हसरत मोहानी ने बेशुमार मुसीबतें और मुश्किलें बर्दाश्त कीं, जिस्मानी यातनायें झेलीं और ज़िंदगी के कई बरस जेल में गुज़ारे। उनका दिया हुआ नारा ‘इन्क़िलाब ज़िंदाबाद’ अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ संघर्ष का प्रतीक बना। हसरत आज़ाद मुल्क में सविधान सभा के सदस्य भी रहे।

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राहत इंदौरी: ये सानेहा तो किसी दिन गुज़रने वाला था

राहत की चुभती हुई शायरी, शेर सुनाने के ड्रामाई अंदाज़ और मौके़-मौके़ पर उनकी तरफ़ से फेंके जाने वाले लतीफ़ों और जुमलेबाज़ी ने उन्हें एक दूसरे ही जहान का शायर बना दिया था। वो माईक पर आते ही मुशायरे की ख़ामोशी को दाद-ओ-तहसीन की गर्मी से ऐसा पिघलाते थे कि देर तक मुशायरा अपने मामूल पर नहीं रह पाता था।

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स्वतंत्रता आंदोलन के तनाज़ुर में लिखी गईं बेहतरीन उर्दू कहानियां

स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर हम आपके लिए उर्दू में लिखी गईं चंद ऐसी कहानियां लेकर आए हैं जो अलग-अलग समय में आज़ादी की तहरीक के तनाज़ुर में लिखी गई हैं। इन कहानियों में आज़ादी से पहले के हिन्दुस्तानी समाज की झलकियां भी हैं और आज़ाद देश के ख़्वाबों की तस्वीरें भी। साथ ही उन दुखों और उम्मीदों के क़िस्से भी जो देश की आज़ादी और विभाजन से वाबस्ता रहे।

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‘गमन’ फ़िल्म की ग़ज़ल: यादें और उम्र जितनी लंबी रातें

प्रतीक्षा की रातें बहुत लंबी होती हैं… बहुत बार एक उम्र जितनी लंबी। उनमें जिंदगी की थकन भी जुड़ती जाती है। इस इंतजार के एक सिरे पर यादें होती हैं तो दूसरे सिरे पर उम्मीद। मगर यादों और उम्मीदों के बीच का फासला इतना लंबा होता जाता है कि संभाले नहीं संभलता। “आप की याद… continue reading

Mohammed Rafi

मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ – दुनिया की पैदाइश का नग़्मा!

हमारे बहुत से निहायत संजीदा और गंभीर अदब के आसमान पर फ़ाएज़ अदबी नक़्क़ाद मेरी इस बात पर यक़ीनन नाक भौं सुकेड़ेंगे कि मेरे अदबी शऊर और शेरी जमालियात की तश्कील और परवरिश में मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ ने माँ की कोख जैसा किरदार अदा किया है। 1960 की दहाई के अवाइल में जब मेरी… continue reading

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